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स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट

Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished190 pages

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६६ स्पन्दकारिका
ही एक मात्र स्वतन्त्र कर्ता के रूप में अवश्य मानना पड़ता है क्योंकि उसका रूप संविदात्मक
है और विश्वात्मक ज्ञातृता और कर्तृता की अहंविमर्शमयी स्फुरणा ही संवित् का यथार्थ
अकृत्रिम स्वभाव है। यही कारण है कि मितप्रमातृभाव की भूमिका पर भी संसार के सारे
अणु, दैनिक आदान-प्रदान के समयों पर, अपनी अपनी आवश्यकतानुसार, निश्चित कार्यों का
उत्पादन करने के लिए जिन निश्चित कारण समूहों का संयोजन अथवा वियोजन करते रहते हैं
उनके मूल में भी स्पन्दात्मक संवित् ही क्रियाशील है। संवित् तो संवित् ही है; न कहीं कम
न कहीं अधिक। अतः पतिप्रमातृभाव अथवा पशुप्रमातृभाव की भूमिकाओं पर उसकी ज्ञातृकर्तृ
रूप क्रियाशीलता में कोई अन्तर नहीं है। हाँ केवल इतनी बात है कि पशुरूप में वह आवश्य-
कता के अनुसार स्वयं ही जड़ शरीर इत्यादि के प्रति ममत्व अभिमान के क्षोभ का चोला
पहन कर निश्चित देश, काल एवं आकार की परिधियों में क्रियाशील है जबकि पतिरूप में
उसकी क्रियाशीलता पर कोई अंकुश नहीं है। वास्तव में यदि सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाये तो
संसार के अणुवर्ग में पाया जाने वाला १देहादि के प्रति ममत्व, अथवा संसार के कर्तव्यों के
प्रति कर्तृत्व का झूठा अभिमान् भी तो विश्वशरीरी भगवान् की ही स्फुरणा है। अतः वह जड़
या उदासीन नहीं है।
संसार के पशु, अपने वास्तविक संविदात्मक स्वरूप को भूलकर, कभी भी तृप्त न
होने वाली वासनाओं की मरीचिका के पीछे दौड़ते हुए, 'इस कर्म से मेरी इष्टापत्ति है और
उससे अनिष्टापत्ति होगी' ऐसे संकोचों में पड़कर, उपादेयता और हेयता के क्षोभ अर्थात्
अन्तर्द्वन्द्व में, भावनाओं से जनित संघर्ष का शिकार बन जाते हैं। यदि भगवदनुग्रह और
सद्गुरुओं के कृपाकटाक्ष से पशुहृदय में एक बार ही यह अनुभूति जागृत हो जाये कि—
'वास्तव में मैं देहादि का सत्ताभूत संवित् स्वरूप ही हूँ और सारा विश्व मेरा ही विभव है,
अतः मैं जानने और करने में सर्वदा स्वतन्त्र हूँ' तो उसके सारे पाश स्वयं ही खुल जाते हैं;
वह पशुप्रमातृभाव से ऊपर उठकर अकृत्रिम ज्ञातृत्व और कर्तृत्व का अधिकारी बन जाता है।
इसी को शास्त्रों में 'आत्मबल का स्पर्श' कहते हैं ॥१०॥
[ संसारभाव की शान्ति ]
सूत्रकार ने यहाँ तक के सूत्रों में दृढ़ उपपत्तियों के द्वारा स्पन्दतत्त्व का प्रतिपादन
किया। अब अगले सूत्र में यह समझाया जा रहा है कि धीरे-धीरे अभ्यास की दृढ़ता प्राप्त
होने से, योगी को, अपने में ही उस स्पन्दशक्ति की अनुभूति हो जाती है। अनन्तर उसी
भाव पर स्थिरता प्राप्त करने से उसको जघन्य एवं घृणित पशुयोनियों में भटकते रहने से
छुटकारा मिल सकता है—
तमधिष्ठातृभावेन स्वभावमवलोकयन् ।
स्मयमान इवास्ते यस्तस्येयं कुसृतिः कुतः ? ॥११॥
१. तस्मादेकैकनिर्माणे शिवो विश्वैकविग्रहः ।
कर्तेति पुंसः कर्तृत्वमभिमानोऽपि विभोः कृतिः ॥ (तं०, ९.१७५)