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स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट

Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished190 pages

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५६ स्पन्दकारिका
जाता है। यदि किसी प्रकार अर्थात् गम्भीर अध्ययन, श्रद्धा-भक्ति, अथक-अभ्यास, शक्तिपात-
रूप गुरुकृपा इत्यादि साधनात्मक उपायों के द्वारा इस खाई को पाटना सम्भव हो सके तो
स्वरूपस्पन्द की अनुभूति हो जाती है और पशु भी साक्षात् पति ही बन जाता है।
शैवगुरुओं ने ईश्वरप्रत्यभिज्ञा, तंत्रालोक इत्यादि महान् शैवग्रन्थों में, स्वतन्त्र चैतन्य
की इसी द्विमुखी स्फुरणा के सिद्धान्त और इसके साथ सम्बन्धित अवरोहप्रक्रिया की विस्तृत
एवं गम्भीर विवेचना प्रस्तुत की है परन्तु उसका अध्ययन करना लोहे के चने चबाना ही
तो है। शास्त्र पढ़ने की अपेक्षा बहुधा संशयों की निवृत्ति गुरुओं के वचनामृतों से ही हो
जाती है। अस्तु, जहाँ तक स्वतन्त्र संवित्-भट्टारिका के स्वयं ही अस्वतन्त्र संसारी पशुपदवी
पर अवतीर्ण होने की प्रक्रिया का प्रश्न है उस पर सूत्र १९-२० में यथा सम्भव प्रकाश डाला
जायेगा। यहाँ पर केवल विषय को स्पष्ट करने के लिए शैव दर्शन के स्वातन्त्र्यवाद, अशुद्धि
और माया के स्वरूप पर थोड़ा बहुत प्रकाश डालना आवश्यक है।
स्वातन्त्र्य—शैवशास्त्रों में 'स्वातन्त्र्य' शब्द और 'चैतन्य शब्द पर्यायवाची हैं। दोनों
भाववाचक संज्ञायें हैं। इनको भाववाचक रखने का एक विशेष अभिप्राय है। वह अभिप्राय
आगे स्पष्ट हो जायेगा। पहले यह समझना आवश्यक है कि स्वातन्त्र्य या चैतन्य शब्दों से
ज्ञान और क्रिया के स्वतन्त्र अर्थात् १अनन्यमुखापेक्षी कर्तृत्व का अभिप्राय लिया गया है।
इसका अर्थ विश्वात्मक रूप में सृष्टि, स्थिति, संहार, पिधान और अनुग्रह इन पाँच प्रकार के
दुर्घट कृत्यों के जानने और करने में, अनन्यमुखापेक्षी अर्थात् स्वरूप से इतर और किसी सत्ता
पर निर्भरता का अभाव है। इस स्वतन्त्र२ आत्मनिर्भरता की स्वरूपभूता पूर्णज्ञातृता और
पूर्णकर्तृता की अहंविमर्शनमयी विश्वात्मक-स्फुरणा को ही शैव शब्दों में स्वातन्त्र्य, चैतन्य या
आत्मा इत्यादि नाम दिये गये हैं।
अब यह देखना है कि इस सर्वोत्कृष्ट सत्ता को स्वतन्त्र न कह कर स्वातन्त्र्य या चेतन
न कह कर चैतन्य कहने का अभिप्राय क्या है ? शैवदर्शन में ज्ञातृता और कर्तृता का साधारण
ज्ञान (जानना) या क्रिया (करना) अर्थ नहीं है, प्रत्युत विश्वरूप में प्रत्येक वस्तु के देश, काल
एवं आकार की बाधाओं या सीमाओं से अबाधित रूप में, जानने३ और करने की क्रिया का
स्वतन्त्र कर्तृत्व ही ज्ञातृता और कर्तृता है। साधारण पशुभाव में प्रत्येक जीव भी जानता
और करता है परन्तु उस को एक ही समय पर प्रत्येक वस्तु जानने और करने की स्वतन्त्रता
नहीं है क्योंकि वह देश, काल एवं आकार की परिधियों में सीमित हो कर कुछ ही जान
सकता है या कुछ ही कर सकता है; सारा नहीं। फलतः संसारी जीव में अपने सीमित विश्व
के अनुपात से सीमित स्वातन्त्र्य है। अतः वह प्रतिसमय पर-मुखापेक्षी है।
१. स्वातन्त्र्यमेव च अनन्यमुखप्रेक्षित्वम् आत्मनः स्वरूपम् । (ई० प्र० वि०, १. ८. ११)
२. 'चैतन्यमात्मा'········'चैतन्यं सर्वज्ञानक्रियामयं परिपूर्णं स्वातन्त्र्यम् उच्यते ।
(शि० सू० वि०, १. १)
चैतन्यमात्मनो रूपं सिद्धं ज्ञानक्रियात्मकम् । (शि० स्तो० वि०, १. १)
३. आत्मात एव चैतन्यं चित्क्रियाचितिकर्तृता । तात्पर्येणोदित''''''''। (ई० प्र०, १. ५. १२)