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स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट

Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished190 pages

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Page 55

[ स्पन्दतत्त्व की उपादेयता ]
इस प्रकार स्पन्दतत्त्व की परमार्थसत्ता को सिद्ध करके अब सूत्रकार अगले दो सूत्रों में
इस बात को स्पष्ट कर रहे हैं कि विश्व के अणु अणु में उसी स्पन्दात्मक पारमेश्वरी शक्ति के
स्वातन्त्र्य का प्रसार स्पष्टरूप में दृष्टिगोचर होता है। वह शक्ति उसी स्वातन्त्र्य के द्वारा
जड़वर्ग में अनुस्यूत होकर उसको भी ठीक चेतनधर्मा ही बना लेती है। अतः बड़ी लगन और
अथक प्रयत्न के द्वारा उस मौलिक तत्त्व के परीक्षण करने से ही मनुष्यजन्म चरितार्थ हो
सकता है।
यतः करणवर्गोऽयं विमूढोऽमूढवत् स्वयम्।
सहान्तरेण चक्रेण प्रवृत्तिस्थितिसंहृतीः ॥६॥
लभते, तत्प्रयत्नेन परीक्ष्यं तत्त्वमादरात्।
यतः स्वतन्त्रता तस्य सर्वत्रेयमकृत्रिमा ॥७॥
यतः करणवर्गस्य अन्तश्चक्रसहितस्य विमूढस्याप्यमूढवत् उत्पत्तिस्थितिनिरोधाः,
सोऽन्येषां चैतन्यापादने समर्थः कथं निःस्वभावः । तस्मात् तत् तत्त्वं यत्नेन परीक्षितव्यं
योगिना। यथास्य करणादिषु चैतन्यदाने स्वातन्त्र्यम्, तथा परपुरादिष्वपि सम्भाव्यते;
स्वातन्त्र्यस्य स्वस्वभावभूतस्य सर्वत्राकृत्रिमस्याभ्यासात् यतो व्यक्तिः ॥ ६-७ ॥
अनुवाद
सूत्र—जिस आत्मबल (स्पन्दात्मकबल) के स्पर्शमात्र से ही, आन्तर शक्तिचक्र के
साथ साथ, उस बाह्य अचेतन इन्द्रियवर्ग को भी चेतन की तरह ही सृष्टि, स्थिति और संहार
करने का धर्म प्राप्त होता है, उस तत्त्व (स्पन्दात्मक स्वभाव) का परीक्षण महती श्रद्धा और
भगीरथ प्रयत्न के द्वारा करना चाहिये। ऐसा करना आवश्यक है क्योंकि उस तत्त्व की स्वभाव-
भूत स्वतन्त्रता विश्व के अणु अणु में (प्रत्येक शरीर और प्रत्येक दशा में) व्याप्त है ॥६-७॥
वृत्ति—जिस तत्त्व के बलस्पर्श से आन्तर करणेश्वरीचक्र (खेचरी इत्यादि शक्तिचक्र)
के साथ, इस सारे इन्द्रिय वर्ग को, स्वतः अचेतन (जड़) होने पर भी, चेतन की तरह ही
सृष्टि, स्थिति और संहार करने का धर्म प्राप्त होता है, वह तत्त्व दूसरे (जड़वर्ग से संबंधित)
पदार्थों को चेतनता प्रदान करने में समर्थ होने के कारण, स्वयं स्वभावहीन (चैतन्य से
रहित) कैसे हो सकता है? अतः योगी को चाहिये कि वह भगीरथ प्रयत्न के द्वारा उस तत्त्व
का परीक्षण करे। जिस प्रकार उस तत्त्व को इन्द्रिय इत्यादि जड़ वर्ग में चेतनता का संचार
करने की स्वतन्त्रता है उसी प्रकार इस बात की भी सम्भावना है कि वह दूसरे शरीर, प्राण
इत्यादि को भी चेतनधर्मा बनाने में स्वतन्त्र है। सहज-स्वातन्त्र्य (स्वतन्त्र अहंप्रत्यवमर्श) ही
प्रत्येक पदार्थ का स्वभाव (अपना वास्तविक भाव-आत्मा) बन कर अवस्थित है। अतः
अभ्यास (श्रमहीन साधना) करते से ही उसकी अनुभूति हो जाती है ॥ ६-७ ॥