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स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट

Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished190 pages

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सुखिता इत्यादि में स्पन्द की अनुस्यूतता ३७
उनके मतानुसार किसी भी १प्रकार के ज्ञान के साथ कोई न कोई विशेषता अवश्यमेव
उपाधि बन कर रहती है। यदि रजत का ज्ञान है तो उसमें रजतत्व साथ रहता है। इसका
अभिप्राय यह हुआ कि किसी विशेषता अथवा उपाधि के द्वारा ही किसी वस्तु का यथार्थ ज्ञान
उत्पन्न हो जाता है। प्रस्तुत प्रकरण में भी इसी नियम के अनुसार 'मैं सुखी हूँ' 'मैं दुःखी
हूँ' इत्यादि परामर्शों में सुखिता अथवा दुःखिता रूप विशेषताओं या उपाधियों के द्वारा ऐसे
किसी आत्मा नामक वस्तु की, अनुमान के द्वारा, प्रतीति हो जाती है, जो इन उपाधियों से
विशिष्ट है। 'मैं सुखी हूँ' इत्यादि परामर्शों में दो प्रकार की प्रतीतियाँ अनुभव में आती हैं—
एक, सुखिता इत्यादि रूप विशेषता या उपाधि की और दूसरी 'मैं' की। २सुखिता इत्यादि
की प्रतीतियाँ गुण हैं। गुण गुणी के विना स्वतंत्र रूप में ठहर नहीं सकता है। उसको किसी
आधारभूत गुणी की आवश्यकता रहती है। फलतः सुखिता इत्यादि का गुणी वही हो सकता
है जिसकी प्रतीति 'मैं' से हो जाती हैं। वही आत्मा है।
इसके साथ ही यह भी स्मरणीय है कि ३सुखिता, दुःखिता इत्यादि उपाधियों का किसी
उपाधि-विशिष्ट आधार के बिना, घट, पट, की तरह अलग दर्शन नहीं होता है अतः
'मैं सुखी हूँ' इत्यादि के द्वारा 'सुखिता' इत्यादि उपाधियों से विशिष्ट 'मैं' अर्थात् आत्मभूत
वस्तु की प्रतीति अनुमान के द्वारा हो जाती है।
फलतः आत्मा के विषय में इनका निर्णय यह है कि 'आत्मा' के सद्भाव का अनुमान
'मैं' प्रतीति के साथ समवाय सम्बन्ध से रहनेवाली 'सुखिता', 'दुःखिता' इत्यादि विशेषताओं
के द्वारा लगाया जा सकता है। इस आत्मा के दो अंश हैं—चिद् और अचिद् । ४चिद् अंश
से वह ज्ञान का अनुभव करने वाला और अचिद् अंश से सुखिता इत्यादि उपाधियों की विशि-
ष्टता को प्राप्त करने वाला है। भाव यह कि आत्मा स्वयं ही सुखदुःखादिरूप नहीं अपितु
तद्विशिष्ट है। अर्थात् सुख, दुःख इत्यादि विशेषताओं के द्वारा परिणाम को प्राप्त करता है।
५कुमारिलभट्ट इतना भी मानते हैं कि आत्मा स्वयं चेतन वस्तु नहीं अपितु शरीर और विषय
के साथ संयोग होने की अवस्था में वह 'चैतन्य-विशिष्ट' बन जाती है। यही कारण है कि
स्वप्नावस्था में विषयों के साथ सम्बन्ध छूट जाने के कारण आत्मा में तत्काल पर्यन्त चैतन्य
नहीं रहता है। फलतः आत्मा जड़ भी है और बोधात्मक भी है।
१. भारतीय दर्शन, पृष्ठ ३२४.
२. सुखादि चेत्यमानं हि स्वतन्त्रं नानुभूयते ।
मतुबर्थानुवेधात्तु सिद्धं ग्रहणमात्मनः ।। (ई० प्र० वि०, पृष्ठ ५८, टि० २१)
३. इदं सुखमिदं ज्ञानं दृश्यते न घटादिवत् ।
अहं सुखीति तु ज्ञप्तिरात्मनोऽपि प्रकाशिका ।। (तत्रैव)
४. चिदंशत्वेन दृष्टृत्वं सोऽयमिति प्रत्यभिज्ञा, विषयत्वं च अचिदंशेन, ज्ञानसुखादिरूपेण
परिणामित्वम् । (कश्मीरिक सदानन्द-अद्वैतब्रह्मसिद्धिः)
स आत्मा अहंप्रत्ययेनैव वेद्यः । (भा० द०, पृ० ६०२)
५. भारतीय दर्शन, बलदेव उपाध्याय, पृष्ठ ३२८.