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स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट

Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished190 pages

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Page 36

२६ स्पन्दकारिका
विवरण
आन्तर और बाह्य पदार्थों की विमर्शरूपता
शैवशास्त्रों का सिद्धान्त है :—'यदन्तस् तद् बहिः' । इसका अभिप्राय यह है कि
स्पन्दात्मक विमर्शभूमिका में सारे प्रमेयपदार्थों की विद्यमानता उसीप्रकार विमर्शरूप में ही
विद्यमान है जिस प्रकार छोटे से बीज¹ में बड़े-से-बड़े न्यग्रोध वृक्ष की शाखायें, पत्ते, फूल
और फल इत्यादि की कल्पना बीजरूप में ही विद्यमान होती है । चैतन्य में स्वभावतः प्रसार
का रस होने के कारण वही आन्तर कल्पना बाह्य स्थूल नानारूपता में विकसित होती है ।
अतः जो ही अन्दर है वही बाहर है । विषय को सुगम बनाने के लिए पहले इस सिद्धान्त का
परीक्षण जीवभाव के स्तर पर करना ही युक्तियुक्त होगा—
साधारण जीवभाव के स्तर पर भी यही देखा जाता है कि प्रत्येक प्राणी के आन्तर
विमर्श में उसके परिचित प्रमेयभाव विमर्शरूप में ही अवस्थित रहते हैं । अपने-अपने मानसिक
विस्तार के अनुपात से जिस प्राणी का जितना विमर्श होता है उतना ही उसके संसार का
विस्तार होता है । परन्तु इतना तो निश्चित है कि जो ही बातें विमर्श में विद्यमान होती हैं
उन्हीं का बाह्य अवभासन होता रहता है । उदाहरण के तौर पर—'कुम्हार घड़ा बनाता
हैं'—इस परामर्श का दार्शनिक विश्लेषण करने से कुछ बातों की ओर ध्यान आकर्षित होता
है । पहली यह कि घट एक कार्य है जो किसी चेतन कुम्हार की क्रिया का विषय बना हुआ
है । दूसरी यह कि घट स्वयं विमर्शहीन अथवा जड़ होने के कारण न तो स्वरूप को जानता
है और न अपने से भिन्न और किसी वस्तु को सत्ता प्रदान कर सकता है । तीसरी यह कि
कुम्हार चेतन होने के कारण ही मिट्टी के पिंड को घट का रूप दे सकता है जब कि मिट्टी
स्वयं घट का रूप धारण नहीं कर सकती है । इन बातों के साथ-साथ मन में एक शङ्का भी
उत्पन्न हो जाती है कि घट की रचना करते-करते शराव अथवा शरावों को बनाते-बनाते
प्याले क्यों नहीं बन जाते हैं ।
इस शङ्का का समाधान ढूँढ़ते-ढूँढ़ते अन्ततोगत्वा हमें यह स्वीकार करना पड़ता है
कि कुम्हार के अन्तर्विमर्श में, घट इत्यादि पदार्थों को बाह्य साकारता प्रदान करने से पहले
ही उनकी आकृति, मान, रंग इत्यादि की यथावत् कल्पना विद्यमान होती है । रचना करते
समय केवल इतना होता है कि कुम्हार के अन्तस्² में विद्यमान कल्पना बाह्य साकार रूप में
विकसित हो जाती है और दोनों रूपों में तिल जैसा भी फर्क नहीं पड़ता है ।
यदि कुम्भकार के विमर्श में ये कल्पनायें पहले से ही विद्यमान न होतीं तो वह उनको
बाह्य साकाररूप देने में असफल ही रहता । फलतः घट कुम्हार के आन्तरिक विमर्श के
बाह्य अवभास-मात्र के अतिरिक्त स्वतः कुछ भी नहीं है ।
१. यथा न्यग्रोधबीजस्थः शक्तिरूपो महाद्रुमः ।
तथा हृदयबीजस्थं जगदेतच्चराचरम् ॥ (प० त्रि०, २४) ।
२. तदेवं व्यवहारोऽपि प्रवृद्धेरूढिमाविशन् ।
भान्तमेवान्तरर्थौघमिच्छया भासयेद् बहिः ॥ (ई० प्र०, १, १.६.७)