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स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट

Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished190 pages

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Page 113

निरन्तर प्रयत्न की अनिवार्यता १०३
CC-0.In Public Domain. Digitization by eGangotri
विकल्प' है । पूर्णसंस्कार की अवस्था में पहुँचने से पहले विकल्प को १'अस्फुट, स्फुटता के
उन्मुख, स्फुट होता हुआ और पूर्णप्रस्फुटित' इन चार अवस्थाओं में से गुजरना पड़ता है ।
अन्तिम अवस्था पूर्णविकास की अवस्था है । यहाँ तक पहुँचते पहुँचते असत्-विकल्पों के
संस्कार भी नष्ट हुये होते हैं । फलतः संवित् स्वयं ही २निर्मल पारमार्थिक विकल्प के रूप में
निखर उठती है । संस्कृत विकल्पों के संस्कारों के द्वारा आगे आगे जो दूसरे संस्कृत विकल्प
उद्भूत होते रहते हैं वे शुद्धविद्या के ही ३अंश होते हैं । दूसरे शब्दों में इनको सद्-ज्ञान या सत्-
तर्क४ के विकल्प भी कहते हैं । सत्-तर्क ही तो योग का उत्तम अंग माना गया है क्योंकि इसके
द्वारा शनैः शनैः, चित्त पर जमी हुई तामसिक या राजसिक काई हट जाती है और विकल्प
का वह अनुपम रूप विकसित हो जाता है जोकि संसारिता का कारण बने हुये असत्-तर्क का
सशक्त ५प्रतिद्वन्द्वी बनकर, उसको मटियामेट कर देता है ।
यद्यपि विकल्प संस्कार की प्रक्रिया के द्वारा संस्कृत हो जाने पर विकल्प का पारमा-
र्थिक रूप उदित हो जाता है तथापि इतने से ही उपर्युक्त प्रयत्न की इतिश्री नहीं हो जाती
है । विकल्प अन्ततः विकल्प ही है चाहे वह सत्-विकल्प (पारमार्थिक विकल्प) हो या असत्
विकल्प (सांसारिक विकल्प) हो । जब तक मन में किसी भी प्रकार का विकल्प विद्यमान हो
तब तक विशुद्ध चिन्मात्ररूप शिवभाव की अखण्ड अनुभूति प्राप्त होना या स्वशक्तिविरोध के
भूत से पिंड छूटना दुर्लभ ही है । अतः सिद्ध गुरुओं ने श्रेयस्काम शिष्यों को बार बार सचेत
किया है कि मन में पारमार्थिक विकल्पों का उदय हो जाने पर भी विवेकी व्यक्तियों को
६इतराना नहीं चाहिये अपितु संस्कार-प्रक्रिया के द्वारा उनका भी तब तक संस्कार करते रहना
चाहिये जब तक विशेषस्पन्द रूप चित्त, सामान्य स्पन्दरूप अभेद-भूमिका में पूर्णतया विश्रान्त
होकर, विकल्पहीन संवित्-स्वभाव में ही विलीन हो जाये ।
ऐसे ही निर्मल ७चित्त के साथ शाक्त उपाय के आधारभूत मन्त्रगण का विमर्शात्मक
१. चतुःष्वेव विकल्पेषु यः संस्कारः क्रमादसौ ।
अस्फुटः स्फुटताभावी प्रस्फुटत् स्फुटितात्मकः ।। (तत्रैव, ३.४)
२. ततः स्फुटतमोदारताद्रूप्यपरिवृंहिता ।
संविदभ्येति विमलामविकल्पस्वरूपताम् ।। (तत्रैव, ३.६)
३. इत्थं विचित्रैः शुद्धविद्यांशरूपैः विकल्पैः...................। (तं० सा०, पृष्ठ २७)
४. न च. अत्र सत्तर्कात् शुद्धविद्याप्रकाशरूपात् ऋते अन्यत् योगाङ्गं साक्षात् उपायः ।
(तत्रैव, पृष्ठ २३)
५. अतः प्रतिद्वन्द्विरूपो विकल्प उदितः संसारहेतुं विकल्पं दलयति इति अभ्युदयहेतुः ।
(तं० सा०, पृष्ठ २१)
६. परमार्थविकल्पेऽपि नावसीयेत पण्डितः ।
को हि भेदो विकल्पस्य शुभे वाप्यथवाऽशुभे ।। (तं०, ४. ६ में उदाहृत)
७. अथ च मन्त्रदेवताविमर्शपरत्वेन प्राप्ततत्सामरस्यम् आराधकचित्तमेव मन्त्रः ।
(शिवसूत्रवि०, २ १).
Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal