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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

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( ४४ ) सिंहासनबत्तीसी.

साथ हूं; क्योंकि तुमने प्रतिपाल किया है. तब उसेभी सेठने
जहाजपर चढालिया. और रवाना हुआ कितनेक दिनोंके बाद
जहाज मॅझधारमें तुफानसे तबाह होने लगा. तब वहां लंगर
डालकर उसी जगह चंदरोज रहा. उससे आगे टापू था
सिंहावती नाम राजकन्या रहतीथी. हजार कन्या उसके साथ थीं
इसमें जब वह तुफान होगया तब सेठने कहा कि, अब लंगर
उठाओ और चलो. लंगर जलके बीच कहीं अटक रहाथा.
मुश्किलसे उठ न सकताथा. जोर कर रहेथे, निदान निराश होकर
सब परमेश्वरका स्मरण करने लगे और कहने लगे । कि-इस
मझधारसे पार करनेवाला तेरे सिवाय कोई नहीं. जहां जहां
जिस जिसके तईं मुश्किल पडी है, तहां तहां सहाय हुआ
है दीनदयालु तेरा नाम है, इसवास्ते तुझको हम शरण है
और हमपरभी दया करो इतनेमें बनियां घबरा कर विक्रमसे यह
कहने लगा. अब अथाहमें पडे हुए हैं, किनारा हमें नजर नहीं
आता, और एक बात तेरेही इस वखत याद आई है जब तू
हमारे पास नौकर रहाथा तब तूने इकरार किया था कि,
मुश्किल काम मैं आशान करूंगा. तो इससे और क्या कठिन
होगा ? कालके मुँहमें अब पड गये हैं. यह सेठजीकी बात सुनकर
विक्रम उठा और फरी खाडा हाथमें ले रस्ता पकड जहाजके
नीचे उतर गया. जाकर बहुतसी हिकमत की पर काई हिकमत