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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

Singhasan Battisi (Dvatrimshat Puttalika)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

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इक्कीसवीं पुतली २१. ( ११६ )

इसके तई रोग और कुछ नहीं इनके तो प्रियतमका वियोग है
जिससे इसकी यह गति बनी है. यह बात सुन कामकंदलाने
आँखें खोल उसकी तरफ देखा. और कहा कि-इसका कुछ
इलाज तुम्हारे पास होय सो करो. तब उसने कहा कि, इसका
इलाज तो था पर इसमें हमें कुछ कहते बन नहीं आता. तब
वह बोली-तुम्हारे पास इलाज क्या था ? वह बताओ राजाने
कहा-माधव नाम एक ब्राह्मण था उसे हमने उज्जैन नगरीमें
विरहवियोगी अति शोकी देखा. सो वह दुःख उपाय मर गया
यह सुनतेही हाय कर उसने भी अपना प्राण छोड़ दिया.
जितनी दासी दारा उनके घरमें थे. यह दशा देख सिर पीट
पीट सब रोने लगे. तब उन्होंने कहा कि-तुम कुछ चिंता अपने
मनमें मत करो. इसे मूर्च्छा आई है कितनी देरमें सुध आवेगी
तुम इसकी चौकसी करते रहो मैं जाकर अपने घरसे घरसे
औषध लाऊ ऐसा कह राजा उलटा फिर अपने दलमें आया और
माधवके आगे उसके मरनेकी खबर कही. सुनतेही एक आहके
साथ उसकी भी जान निकल गई, यह देखकर राजा अपने
जीमें पछताया. विचार करने लगा कि जिसके वास्ते इतनी
सेना साजके साथ परभूमिमें आया और इसे इस तरह खो दिया.
यह हत्या मेरेपर हुई. अब अपना भी प्राण रखना उचित नही
यह बात जीमें ला बहुतसा चंदन मंगवा चिता बनाय राजा