सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
Singhasan Battisi (Dvatrimshat Puttalika)
by पारम्परिक / लल्लू जी लाल
Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)
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Read in context( १३२ ) सिंहासनबत्तीसी.
कि, राजाने मुझे निकाला अब मैं कहा रहूं, यों अनेक भाँतिकी
चिंताकर कामकंदलाका नाम लैले रोताथा. और इधर काम
कंदलाभी राजासे बहना करके बिदा हुई और एक आदमी
दौड़ाया कि यह ब्राह्मण बाहर जाने न पावे उसे ढूंढ ले
जाकर मेरे मकानमे बिठा, वह आदमी गया और ब्राह्मणको
ले जाकर कामकंदलाके मंदिरमे बिठा दिया. इधरसे यह भी
तुरत जा पहुंची. और वह दोनों आपसमें बैठकर प्रेमकी बाते
करने लगे तब उस ब्राम्हणने कहा-मुझे राजाने देशसे निकाल
दिया है और तूने अपने घरमे बुला बिठलाया; जो यह बात
राजा सुनेगा तो मेरा प्राण पहिलेही जायगा. इससे में तो
दुःखसे छुटूंगा पर तुझेभी राजा अतिकष्ट देगा इसमें ऐसी
बात करनी उचित नहीं है कि अपनी तो जान जाय और
जगमें हँसाई होय इसवास्ते प्रेम जो है सो दुःखकी खान
है, जिसने प्रेमके पँडेमें पाँव दिया उसने कभीही सुख न पाया.
ये बातें माधवके मुखसे सुनकर कामकंदलाने कहा कि, अब
तो मै इस पंथमे आई जो कुछ करे सो भगवान् है इतना कह
सब साज बाज घरसे मँगवाकर अपनी विद्या जाहीर करने लगी
जितनी विद्या उसे याद थी उतनी ही जब प्रकाश कर चुकी
तब माधवने उन्हें यंत्रोंके साथ अपने पास जो गुप्त था सोही
सब प्रकाश करके दिखाया. जब रात थोडीसी रहगई तब