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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 86 of 590

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Page 86
५८सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

वस्तुतस्तत्समसत्ताकोऽन्यथाभावः परिणामः, तदसमसत्ताको विवर्त इति वा; कारणसलक्षणोऽन्यथाभावः परिणामः, तद्विलक्षणो विवर्त इति वा;

[ नैयायिकोंके मतमें द्व्यणुक आदि जगत्‌के प्रति परमाणु उपादान कारण होते हैं, परन्तु आरम्भकत्वरूपसे होते हैं तथा साङ्ख्यमतावलम्बी प्रकृतिको परिणामितारूपसे जगत्‌के प्रति उपादान कारण मानते हैं, इन दो मतोंके अनुसार अर्थात् आरम्भकत्व और परिणामित्व रूपसे ब्रह्मको जगत्‌के प्रति उपादान कारण नहीं मानना चाहिए, क्योंकि जो कूटस्थ अद्वितीय चैतन्यात्मा है, वह आरम्भक नहीं हो सकता और परिणामवादमें परिणाम और परिणामीका अभेद होनेसे ब्रह्ममें भी विकारिता और जन्म आदिकी प्रसक्ति होगी, अतः उक्त दोनों पक्ष सङ्गत नहीं हैं, इसलिए अविद्या द्वारा प्रपञ्चरूपसे विवर्तमानतारूप उपादानता ही ब्रह्ममें अभीष्ट है अर्थात् जैसे रज्जु आदिमें आरोपित सर्प आदिकी अधिष्ठानता है, वैसे ही ब्रह्ममें जगद्रूप विवर्ताधिष्ठानता है, यह भाव है। इसपर एक विचार होता है कि ब्रह्म और उसके विवर्त जगत्‌का परस्पर अभेद सिद्धान्तमें माना जाता है, अतः आरम्भवादमें आरभ्य और आरम्भकका अभेद न होनेसे उसके त्याग करनेपर भी परिणामवादमें अभेदका सम्भव होनेसे परिणामवाद और विवर्तवादमें कोई वैषम्य सिद्ध नहीं होता है ? इसलिए विवर्त और परिणामके भिन्न स्वरूप प्रदर्शनार्थ उनके पृथक् पृथक् लक्षण करते हैं— ]

उपादानरूपसे अभिमत वस्तुकासमान सत्तावाला अन्यथाभाव—पूर्वरूपकी अपेक्षा अन्यरूपसे अवस्थान—परिणाम है और उपादानसे विलक्षण-सत्तावाला अन्यथाभाव विवर्त है । अथवा कारण—उपादानकारणका समानलक्षण—समानधर्मी अन्यथाभाव परिणाम है और उपादानसे विलक्षण—असमानधर्मी—अन्यथाभाव विवर्त है * ।


* वस्तुतस्तत्सममानसत्ताकोऽन्यथाभावः—इस लक्षणमें वस्तुशब्दसे उस वस्तुका ग्रहण है, जो उपादानत्वरूपसे अभिमत हो, पूर्वरूपकी अपेक्षा अन्यरूपसे अवस्थान—अन्यथाभाव अर्थात् अवस्थाविशेष, यह कैसा होना चाहिए ? तत्समानसत्ताक—तेन समा सत्ता यस्य—अन्यथाभावस्य स तथा अर्थात् उपादानभूत वस्तुकी सत्ता और उससे उत्पन्न हुए कार्यकी सत्ता समान होनी चाहिए, यह भाव है। जैसे—मृत्तिकाका परिणाम है—घट, घटका उपादान कारण है—मृत्तिका और घट है मृत्तिकाका अन्यथाभाव, घटकी जो व्यावहारिक सत्ता है, वही उपादान कारण मृत्तिकाकी

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