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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 84 of 590

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Page 84
५६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

त्रयमेवेदं परस्परनिरपेक्षम् । अत एव 'अत्ता चराचरग्रहणात्' इत्याद्यधिकरणेषु (उ० मी० अ० १ पा० २ अधि० १ सू० ९) सर्वसंहर्तृत्वादिकं ब्रह्मलिङ्गतयोपन्यस्तमिति कौमुदीकारः ।

उपादानत्वविज्ञत्ववस्त्वन्तरनिराक्रियाः ।
व्युत्क्रमाल्लघुधुमाचख्युरन्ये संवलितं त्रयम् ॥ १५ ॥

व्युत्क्रमसे अर्थात् जगज्जन्मस्थितिलयकारणत्वरूप लक्षणके घटक उलटे पदोंसे— (लयकारणत्व, स्थितिकरणत्व और उत्पत्तिकारणत्वके कथनसे) एक ही ब्रह्मरूप वस्तुमें उपादनत्व, सर्वज्ञत्व और अन्य वस्तुके निराकरणके लाभके लिए तीनोंको मिलाकर एक ही जगज्जन्मस्थितिलयकारणत्वरूप लक्षण है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥ १५ ॥

अन्ये तु जन्मकारणत्वस्य स्थितिकारणत्वस्य च निमित्तकारणसाधारण्यात् उपादानत्वप्रत्यायनाय प्रपञ्चस्य ब्रह्मणि लयो दर्शितः । अस्तु ब्रह्म

इत्यादि अधिकरणोंमें सर्वसंहतृत्व (सबका संहारकर्ता) आदिका ब्रह्मके लिङ्ग—ज्ञापकरूपसे उपन्यास किया है, इस प्रकार कौमुदीकार कहते हैं।

जन्मकारणता और स्थितिकारणताके निमित्तकारणसाधारण होनेसे उपादानकारणताका सूचन करनेके लिए ब्रह्ममें प्रपञ्चका विलय ['यतो वा' इत्यादि श्रुतिमें 'यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति' शब्दसे] दिखलाया गया है, [यदि उपादानत्वका सूचन प्रपञ्चके विलयके प्रदर्शनके विना नहीं हो सकता है, तो केवल लयकारणत्व ही ब्रह्मका लक्षण करो, क्योंकि इसीसे ब्रह्ममें उपादान-कारणत्वका लाभ होगा, इसपर 'अस्तु' इत्यादिसे कहते हैं] ब्रह्म जगत्का उपादान भले ही हो, परन्तु जैसे घटकी उत्पत्तिमें मिट्टीरूप उपादान कारणसे 'अन्य निमित्तकारण-कुलाल होता है, वैसे जगत्की उत्पत्तिमें ब्रह्मरूप उपादानसे


परमात्मा, जिस निर्विशेषमें भेदकल्पनासे है, उस निर्विशेष परमात्माको उक्तरूपसे कौन जानता है अर्थात् कोई नहीं जानता) इस श्रुतिमें कहा गया अशनकर्ता परमात्मा ही है, क्योंकि चर और अचरका अत्तृत्व परिगृहीत है, अतः जीव आदिका परिग्रह नहीं कर सकते हैं, क्योंकि वह चराचरका अत्ता नहीं हो सकता।

'इत्याद्यधिकरणमें' आदि शब्दसे अन्तर्याम्यधिकरण [उ० मी० अ० १ पा० २ अ० ५ सू० १८] और जगद्वाचित्वाऽधिकरण [उ० मी० अ० १ पा० ४ अधि० ५ सू० १६] ये दो अधिकरण लिये जाते हैं।

सर्वसंहर्तृत्वादिमें आदि शब्दसे सर्वनियन्तृत्वरूप सर्वस्थितिकर्तृत्व और सर्वजगदुत्पत्तिकर्तृत्व इन दोनोंका ग्रहण करना चाहिए।

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