सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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[ टिप्पणी ]
यदि वेदान्तवाक्य भी उपासना ( आदिका ) विधान करें, तो विधिके संस्कारके लिए प्रवृत्त पूर्वमीमांसासे ही गतार्थ होंगे, यह ब्रह्मजिज्ञासा विफल हो जायगी और विधि-साध्यमोक्ष उत्पत्तिविनाशशील एवं न्यूनाधिकभावग्रस्त हो जायगा, अतः कर्मजन्य स्वर्ग पश्वादि फलोंने, जो अत्यन्त आवश्यक हैं, क्या अपराध किया ? अर्थात् कर्मोंसे होनेवाले स्वर्ग, पशु आदि फलोंसे मोक्षमें कुछ विशेषता नहीं रहेगी । अतः इससे श्रवणादि विधि नहीं है, यह अत्यन्त स्फुट है । इसी प्रकार 'मनननिदिध्यासनयोरपि न विधिः, तयो-रन्वयव्यतिरेकसिद्धसाक्षात्कारफलयोर्विधिसरूपैर्वचनैरनुवादात्' ( १५३ भाम० नि० ) यह कहा गया है, इसलिए वाचस्पतिमनानुयायी श्रवण आदिको विधि नहीं मानते हैं, यह युक्त है । एक और स्थलमें भी श्रवण आदिके विधित्वके खण्डनमें प्रमाण मिलता है—
'ननु 'आत्मा ज्ञातव्यः' इत्येतद्विधिपरैर्वेदान्तैः तदेकवाक्यतयाऽवबोधे' इत्यादिसे आरम्भ कर
'अयमभिसन्धिः—न तावत् ब्रह्मसाक्षात्कारे पुरुषो नियोक्तव्यः; तस्य ब्रह्मस्वाभाव्येन नित्य-त्वात्, अकार्यत्वात्, नाप्युपासनायाम्; तस्या अपि ज्ञानप्रकर्षे हेतुभावस्यान्वयव्यतिरेकसिद्ध-तया प्राप्तत्वेनाऽविधेयत्वात् । नापि शाब्दबोधे, तस्याप्यधीतवेदस्य पुरुषस्य विदितपदतदर्थस्य समधिगतन्यायतत्त्वस्याप्रत्यूहमुत्पत्तेः' इत्यादि । इसका भाव प्रायः पूर्ववत् ही है ।
विधिच्छायार्थवाद—विधिके सदृश अर्थवाद, जैसे 'उपांशु यागमन्तरा यजति' ( आग्नेय और अग्नीषोमीय पुरोडाशके बीचमें उपांशुयाग करे ) इस प्रकार कहकर फिर कहते हैं—
'विष्णुरुपांशु यष्टव्यः, प्रजापतिरुपांशु यष्टव्यः, अग्नीषोमावुपांशु यष्टव्यौ' यहां पहले जो उपांशुयागमन्तरा' इत्यादि अन्तरा वाक्य है, वह आग्नेय और अग्नीषोमीय पुरोडाशके मध्यवर्ती कालमें उपांशुयागका विधान करता है, इसलिए 'विष्णुरुपांशु' इत्यादि तीन वाक्य मन्त्रवर्णोंसे प्राप्त वैकल्पिक देवताओंका अनुवाद करके 'उपांशु यागमन्तरा यजति' इस अन्तरा वाक्यसे विहित यागकी स्तुति करनेवाले अर्थवाद ही हैं, इस प्रकार पूर्वमीमांसा में प्रतिपादन किया गया है ( अ० २ पा० २ अधि० ४ ) वैसे ही 'आत्मा श्रोतव्यः' इत्यादि वाक्य भी अर्थवाद हैं और प्रशंसार्थक हैं, ऐसा समझना चाहिए ।
कोई लोग श्रवण आदिकी विधि माननेके लिए यह भी कहते हैं कि यदि श्रवण में नियम विधि न मानी जाय, तो 'तत्कारणं सांख्ययोगाभिपन्नम्' इत्यादि श्रुतिमें कहे गये योगकी व्यावृत्ति नहीं होगी, इसलिए नियम मानना चाहिए, परन्तु यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि विधिके न माननेपर भी विचार प्राप्त ही है, कारण कि जो विचार करनेकी सामर्थ्य रखता है, उसे किसी कालमें अपनी या अन्यकी अनुपपत्तिसे तत्त्ववस्तुमें सन्देह हो सकता है, इससे निश्चयात्मक वेदान्तार्थके ज्ञानके लिए विधिके बिना भी योग्यतासे विचार अवश्य प्राप्त हो सकता है, अतः विधिकी आवश्यकता नहीं है। सगुण उपासनाकी व्यावृत्तिके लिए कोई नियम-विधि मानते हैं, उनका भी पक्ष युक्तिसङ्गत नहीं है, क्योंकि जो एकदम निस्पृह है, वह ब्रह्मलोककी प्राप्तिके द्वारा मुक्तिके प्रति साधनभूत सगुणोपासनामें कैसे प्रवृत्त होगा अर्थात् कभी नहीं होगा, अतः सगुणोपासनाकी व्यावृत्तिके लिए भी नियमविधि नहीं मान सकते हैं ।