सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in context४० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद
कृतकृत्यतां मन्वानस्याऽविद्यानिवर्तकसाक्षात्कारोपयोगिनि निदिध्यासने प्रवृत्तिर्न स्यादिति अतत्साधनपक्षप्राप्तिमात्रेण निदिध्यासने नियमविधेरभ्युपगततया तन्न्यायेनाऽसाधनस्य समुच्चित्य प्राप्तावपि तन्निवृत्तिफलकस्य परिसङ्ख्याविधेः सम्भवादिति ।
नियमः परिसङ्ख्या वा विध्यर्थोऽत्र भवेद्यतः ॥
अनात्मादर्शनेनैव परात्मानमुपास्महे ॥ १ ॥
इति वार्तिकवचनानुसारिणः केचिदाहुः ॥
श्रवणं ह्यागमाचार्यवाक्यजं ज्ञानमिष्यते ॥
अयोग्येऽत्र विधिर्नैति वाचस्पतिमत्तानुगाः ॥१३॥
शास्त्र और आचार्यके वचनोंसे उत्पन्न होनेवाला आत्मज्ञान ही श्रवण है, अतः उक्त तीनों विधियोंके अविषय श्रवणमें ( कोई भी ) विधि नहीं है, यह वाचस्पतिके अनुयायियोंका मत है ॥ १३ ॥
'आत्मा श्रोतव्यः' इति मननादिवत् आत्मविषयकत्वेन निवध्य-
है और जो शब्दके श्रवणसे उत्पन्न होनेवाले ज्ञानमात्रसे अपनेको कृतकृत्य मानता है तथा अन्य व्यापारोंमें भी जिसकी प्रवृत्ति है, ऐसे पुरुषकी अविद्याकी निवृत्ति करनेवाले साक्षात्कारके उपयोगी निदिध्यासनमें कदाचित् प्रवृत्ति न हो, इसलिए पक्षमें ज्ञानके असाधनकी प्राप्तिमात्रसे निदिध्यासनकी—नियमविधि मानी गई है, इसी न्यायसे समुच्चयसे असाधनकी प्राप्ति होनेपर उसकी निवृत्तिके लिए परिसंख्याविधि हो सकती है, इस प्रकार 'नियमः परिसंख्या वा०' (इस 'आत्मावा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यः' इत्यादि वाक्यमें नियम विधिप्रत्ययका अर्थ होगा । अथवा श्रवणके नित्य प्राप्त होनेसे नियम यदि विधिका अर्थ न हो सके, तो परिसंख्या ही विधिप्रत्ययका अर्थ हो, क्योंकि हम उपासक लोग अनात्मादर्शनसे ही—अनन्यव्यापारसे ही परमात्माकी उपासनामें प्रवृत्त हैं) इस वार्तिकवचनका अनुसरण करनेवाले कुछ लोग कहते हैं ।
मनन आदिके समान 'आत्मा श्रोतव्यः' ( आत्माका श्रवण करना चाहिए ) इस प्रकार आत्मविषयकत्वरूपसे कहा गया श्रवण भी आगम—शास्त्र और