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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

DevanagariHindipublished590 pages

Page 63 of 590

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Page 63

विधिविचार ] भाषानुवादसहिते ३५


शाब्दज्ञाने कारणत्वानुपगमात्, कार्ये क्वचिदपि प्रतिबन्धकाभावस्य कारण-

कारणरूपसे स्वीकार नहीं किया गया, अतः तात्पर्यज्ञानमें और विचारसे होनेवाले प्रतिबन्धकाभावमें द्वारत्वकी उपपत्ति ही नहीं हो सकती है—भाव यह है कि वेदान्तसिद्धान्तमें शाब्दबोधके प्रति तात्पर्यज्ञान और प्रतिबन्धकका (प्रतिबन्धक उसे कहते हैं जो कार्यकी उत्पत्ति न होने दे ) अभाव कार्यमात्रके प्रति कारण नहीं माने गये हैं, इसलिए उनके द्वारा विचार ब्रह्मज्ञानका, जो शब्द प्रमाणका फल है, कारण नहीं हो सकता, क्योंकि द्वार शब्दका अर्थ है—'तज्जन्यत्वे सति तज्जन्यजनकत्वम्' अर्थात् जो स्वयं कारणसे उत्पन्न होकर कारणसे उत्पन्न होनेवाले कार्यके प्रति कारण हो, जैसे घटके प्रति दण्ड कारण होता है, इसमें द्वार है—भ्रमि, भ्रमि दण्डसे उत्पन्न होती है और दण्डसे उत्पन्न होनेवाले घटके प्रति कारण है, इसलिए भ्रमिमें द्वारता है । प्रकृतमें जब शाब्दबोधके प्रति तात्पर्यज्ञान * और कार्यके प्रति प्रतिबन्धकाभाव † कारण ही नहीं हैं, तब


* शाब्दबोधके प्रति यदि तात्पर्यज्ञान कारण माना जाय, तो शुक (सुग्गा) से कहे गये शब्दसे शाब्दबोध न होगा, क्योंकि वहाँ वक्ताके तात्पर्यका अभाव है और लोकमें व्यवहार भी होता है—'शुक आदिके शब्दसे अर्थका बोध होता है, लेकिन वहाँ तात्पर्य नहीं है' इससे शाब्दबोधके प्रति तात्पर्यज्ञान हेतु नहीं है, यह स्पष्टतः ज्ञात होता है । 'वहाँ भी ईश्वरका तात्पर्य है' इस प्रकारकी कल्पना भी नहीं कर सकते हैं, क्योंकि ईश्वरके तात्पर्यकी शाब्दबोधरूप फलके बाद कल्पना होगी, पहले तो ईश्वरतात्पर्य दुर्बोध ही है, शब्दके सान्निध्यसे भी तात्पर्यका निर्णय नहीं कर सकते, क्योंकि 'अहो ! विमलं जलं नद्याः कच्छे महिषाश्चरन्ति' इत्यादिमें 'नद्याः' का सन्निधान जल और कच्छके साथ एकसा है और 'पय लाओ' ऐसा कहनेपर 'जल' या 'दूध' इस प्रकार प्रश्न होनेसे यह कल्पना अवश्य होती है—वक्ताके तात्पर्यका परिज्ञान न रहनेपर भी शाब्दबोध होता है, इसलिए शाब्दज्ञानमें तात्पर्यज्ञान कारण नहीं है, ऐसा प्रतीत होता है ।

† प्रतिबन्धकाभाव कार्यमें कारण नहीं है, इसमें युक्ति यह है कि प्रतिबन्धकाभावको कार्यकी सामग्रीमें अन्तर्भाव नहीं कर सकते, क्योंकि 'सामग्रीके रहनेपर भी प्रतिबन्धकके रहनेसे कार्य उत्पन्न नहीं हुआ' इस प्रकार व्यवहार देखा जाता है, यदि सामग्रीके अन्दर प्रतिबन्धकाभावका समावेश होता, तो प्रतिबन्धकसे कार्यकी उत्पत्ति नहीं हुई, इस प्रकार न बोलते । इससे यह ज्ञात होता है कि अप्रतिबद्ध सामग्री कार्यके प्रति कारण है। इस अवस्थामें अप्रतिबद्ध-प्रतिबन्धकाभावयुक्त, यह सामग्रीका विशेषण हुआ अर्थात् सामग्रीकी कारणताका अवच्छेदक—विशेषण हुआ। जो कारणताका अवच्छेदक होता है, वह कार्यका कारण नहीं होता, क्योंकि वह अन्यथासिद्ध होता है। इसीलिए घट के प्रति दण्डत्व कारण नहीं है, परन्तु दण्ड कारण है, प्रकृतमें भी प्रतिबन्धकाभावके