सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in contextमुक्तके स्वरूपका विचार ] भाषानुवादसहित ५५३
विमुक्तैरुपसृप्यता' इति । एतदसम्भवश्च एकजीववादपारमार्थिकजीवभेदवादयोरपि दोषः ।
जीवेशभेदसत्यत्वेऽप्येतत्सर्वमसङ्गतम् ।
न च शक्त्यन्तरं जीवे प्रमाणफलवर्जनात् ॥ २३ ॥
आसर्वमुक्ति परकल्पितसत्यकामसङ्कल्पकल्पितजगत्स्थितिभङ्गसर्गे ।
शक्तं स्वतः तु सुखचिद्घनमद्वितीयं मुक्तोपसृप्यमहमस्मि विशुद्धतत्त्वम् ॥ २४ ॥
श्रुतिकल्पलताकुञ्जसञ्जाता सूक्तिमञ्जरी ।
रम्या राद्धान्तगन्धाढ्या रञ्जयत्वखिलान् बुधान् ॥ २५ ॥
यदि जीव और ईश्वरका भेद सत्य माना जाय, तो पूर्वोक्त समाधान असङ्गत हो जायगा, और जीवमें पारमार्थिक किसी अन्य शक्तिकी कल्पना नहीं करनी चाहिए, क्योंकि उसमें प्रमाण और फल नहीं है। सम्पूर्ण जीवोंकी मुक्ति जब तक न हो तब तक अविद्यावान्पुरुषके कल्पित सत्यकाम और सत्यसंकल्पसे कल्पित जगत्की स्थिति, लय और उत्पत्ति में समर्थ और मुक्त पुरुषों द्वारा प्राप्य स्वतः चिद्धन अद्वितीय ब्रह्म मैं हूँ। श्रुतिरूप कल्पलताके कुञ्जसे उत्पन्न हुई अनेक सिद्धान्तरूपी सुगन्धिसे परिपूर्ण सुन्दर सूक्तिमञ्जरी सम्पूर्ण विद्वानोंका मनोरञ्जन करे ॥२३॥२४॥२५॥
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीमद्रामचन्द्रसरस्वती-
पूज्यपादशिष्यगङ्गाधरेन्द्रसरस्वत्याख्यभिक्षुविरचिता
वेदान्तसिद्धान्तसूक्तिमञ्जरी सम्पूर्णा ।
है। और * इसका असम्भव रूप दोष एकजीववाद और पारमार्थिक जीव-भेदवादमें भी है।
* एकजीववादमें मुक्तकी ईश्वरभावापत्ति नहीं है, यह पहले ही बतलाया जा चुका है। और जीव एवं ईश्वरका भेद भी पारमार्थिक है, इस वादमें भी जीवकी ईश्वरभावापत्तिका असम्भव स्पष्ट ही है, किं बहुना ! जीवेश्वरका पारमार्थिक भेद माननेवालोंके मतमें जीवका शुद्ध चैतन्यस्वरूपसे अवस्थान भी नहीं बन सकता है, यह भाव है।