सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in context| २८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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तथा तदीयाः शब्दस्तु परोक्षज्ञानकृत् पुरा ॥
मननादियुतोऽध्यक्षं कुर्याद्विधुरचित्तवत् ॥ ७ ॥
विवरणानुयायियोंमें से कुछ लोग कहते हैं कि शब्द पहले परोक्ष ज्ञान उत्पन्न करता है तदनन्तर वही शब्द मनन, निदिध्यासनसे युक्त होकर विधुरके चित्तके समान ( अर्थात् जैसे विधुरका चित्त कामिनीपरिभावित होकर कामिनीका अपरोक्ष साक्षात्कार करता है, वैसे ही ) अपरोक्ष साक्षात्कार उत्पन्न करता है ॥ ७ ॥
कृतश्रवणस्य प्रथमं शब्दान्निर्विकित्सं परोक्षज्ञानमेवोत्पद्यते, शब्दस्य परोक्षज्ञानजननस्वभाव्येन क्लृप्तसामर्थ्यानतिलङ्घनात् । पश्चात्तु कृतमनननिदिध्यासनस्य सहकारिविशेषसम्पन्नात् तत एवाऽपरोक्षज्ञानं
[ 'श्रोतव्यः' इस वाक्यसे श्रवणका जो विधान किया जाता है, वह निश्चयात्मक शब्दजन्य परोक्षज्ञानके उद्देश्यसे ही किया जाता है, शब्दजन्य अपरोक्षज्ञानके लिये नहीं किया जाता, क्योंकि शब्द स्वभावसे ही परोक्षज्ञानका जनक होता है और जैसे संस्कारसे सहकृत चक्षु 'स एवायं देवदत्तः' इस प्रत्यभिज्ञाका जनक होता है अथवा भावनाधिक्यसे युक्त वियोगी पुरुषका मन कामिनीके साक्षात्कारका जनक होता है, वैसे ही मनन और निदिध्यासनसे युक्त शब्द अपरोक्षज्ञान जनक भी हो सकता है। इससे यह विधि परोक्षज्ञान अथवा अपरोक्षज्ञानके लिए अपूर्वविधि नहीं है किन्तु नियमविधि है, क्योंकि विधिके बिना भी पूर्वोक्त दो कार्यकारणभावोंके प्रभावसे विचारविशिष्ट वेदान्तात्मकश्रवण प्राप्त है, इसलिए पूर्वोक्त भाषाप्रबन्ध आदिकी व्यावृत्ति करनेके लिए यह नियमविधि ही है इस प्रकार विवरणानुसारियोंके एकदेशियोंके मतका प्रतिपादन करते हैं—'कृतश्रवणस्य' इत्यादि ग्रन्थसे ] वेदान्तश्रवणकर्त्ता पुरुषको प्रथम शब्दसे निश्चयात्मक परोक्ष ज्ञान ही उत्पन्न होता है, क्योंकि परोक्ष ज्ञानके उत्पादनमें ही शब्दकी सामर्थ्य है, इससे अपने निश्चित स्वभावका शब्द उल्लङ्घन नहीं कर सकता। तदनन्तर अर्थात् शब्दसे निश्चयात्मक परोक्ष ज्ञान होनेपर मनन और निदिध्यासन करनेवाले पुरुषको मनन आदि सहकारी कारणोंसे युक्त शब्दसे ही अपरोक्ष ज्ञान होता है। क्योंकि सहकारी कारणकी विचित्रतासे कार्यमें विचित्रता देखी जाती है, इसीसे जैसे 'सोऽयं
कि मन्त्रोंसे ही मन्त्रार्थका अनुस्मरण करना चाहिए। [द्रष्टव्य—अधिकरण न्या० पृ० २५ आनन्दाश्रम मु०] ।