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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

DevanagariHindipublished590 pages

Page 552 of 590

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Page 552

५२२ सिद्धान्तलेशसंग्रहः [चतुर्थ परिच्छेद


संसर्ग्यत्यन्ताभावालम्बनतोपपत्या ध्वंसविषयत्वस्याऽकल्पनीयत्वाच्च । एवं सति घटोत्पत्तेः पूर्वं तदभावव्यवहारोऽप्यत्यन्ताभावेन चरितार्थ इति प्रागभावोऽपि न स्यादिति चेत्, सोऽपि मा भूत् । नन्वेवं 'प्रागभावाधारकालः पूर्वकालः, ध्वंसाधार उत्तरकालः' इति निर्वचनासम्भवात् काले पूर्वोत्तरादिव्यवहारः किमालम्बनस्स्यात् । घटादिषु प्रतियोगित्वादिव्यवहारवदखण्डकिञ्चिद्धर्मगोचरोऽस्तु । अभावरूपस्थायिध्वंसाभ्युपगमेऽपि तेषु ध्वंसत्वादेरखण्डस्य वक्तव्यत्वात् । न च जन्याभावत्वरूपं सखण्ड-


घटाभावव्यवहारके समान विशेषसमयमें सम्बन्ध रखनेवाले अत्यन्ताभावको ही अवलम्बन करता है, इसलिए उसको ध्वंसविषयक मानना अनुचित है । यदि इस परिस्थितिमें † शङ्का हो कि घटकी उत्पत्तिके पूर्वमें घटाभावका व्यवहार भी अत्यन्ताभावसे ही उपपन्न हो सकता है, अतः प्रागभावकी भी सिद्धि नहीं होगी, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रागभावका भी अङ्गीकार नहीं करते हैं । यदि शङ्का हो कि प्रागभाव और ध्वंस न मानें जायें, तो प्रागभावका आधारभूत काल पूर्वकाल है और ध्वंसका आधारभूत काल उत्तरकाल है, इस प्रकारसे पूर्वकाल और उत्तरकालका निर्वचन नहीं कर सकते हैं, अतः कालमें जो पूर्वत्व और उत्तरत्व आदि व्यवहार होते हैं, वे किसको आलम्बन करेंगे ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जैसे घट आदिमें प्रतियोगित्व आदिका व्यवहार अखण्ड प्रतियोगित्वादि धर्मविषयक है, वैसे ही कालमें पूर्वत्वादि व्यवहार भी अखण्ड पूर्वत्वादि धर्मविषयक ही है । और अभावरूप स्थायी ध्वंसके माननेपर भी उस अभावमें ध्वंसत्व आदि अखण्ड धर्म ही मानने पड़ेंगे ‡ । यदि शङ्का हो कि 'जन्यत्वे सति अभावत्वम्' अर्थात् जन्य होकर जो अभाव हो, वह ध्वंस है, ऐसा ध्वंसका निर्वचन करनेसे ध्वंसत्व सखण्ड ही सिद्ध होता है, अखण्ड नहीं; तो यह


नश्वर है) इस श्रुतिसे पराभिमत नित्य ध्वंसका खण्डन भी हो जाता है । अतः ऐसे पदार्थोंकी कल्पना प्रमाणशून्य है ।

† घटनाशके उत्तरकालमें होनेवाले अभावव्यवहारकी सामयिक अत्यन्ताभावसे ही उपपत्ति हो सकती है, इस अवस्थामें, यह भाव है ।

‡ अर्थात् ध्वंसत्व और प्रागभावत्व आदि धर्मोंको पूर्वपक्षी भी अखण्ड धर्म ही मानता है, अतः पूर्वत्वादि धर्मोंको अखण्ड धर्म माननेमें गौरव नहीं है, यह भाव है ।