सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
Page 550 of 590
Read in context| ५२० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ चतुर्थ परिच्छेद |
|---|
तस्मात् प्रकृत्यर्थगतमेव वर्त्तमानत्वादि आख्यातार्थ इति ध्वंसस्य स्थायित्वे चिरनिवृत्तेऽपि घटे 'निवर्तते' इति व्यवहारो दुर्वारः ।
यदि च मुद्गरादिशकलिते घटे ध्वंसो नाम कश्चिदभावस्तत्प्रतियोगिकः स्थायी भूतलाद्याश्रित उपेयते, तदा कपालमालापसरणे तदनपसरणेऽपि मणिकशरावादिकपालव्यावृत्तकपालसंस्थानविशेषादर्शने च किमिति स
व्यापार, जो कि आख्यातार्थ है, वर्त्तमान है । इससे अर्थात् किसी अर्थान्तरके न होनेसे प्रकृत्यर्थगत वर्त्तमानत्व आदि ही आख्यातार्थ है, इससे ध्वंसको स्थायी माननेमें चिरनिवृत्त घटमें 'निवर्तते' (अब निवृत्त होता है) ऐसा व्यवहार अवश्य होगा ।
* मुद्गर आदिसे घटके शकलित (खण्डित) होनेपर ध्वंस नामका घटप्रतियोगिक स्थायी और भूतलमें रहनेवाला अभाव यदि माना जाय, तो † कपालमालाके अपसरणमें और अपसरणके अभावमें मणिक, शराव आदिके कपालोंसे व्यावृत्त कपालके संस्थान विशेषका दर्शन न होनेपर भी वह ध्वंस क्यों नहीं प्रत्यक्ष देखा जाता है। यदि शङ्का हो कि कपालोंके
* जो लोग अतिरिक्त अभावरूप ध्वंसका अङ्गीकार करते हैं, वह ध्वंस क्या प्रत्यक्ष है या अनुमेय है, इस प्रकारके दो विकल्प करके क्रमशः उन विकल्पोंका अग्रिम ग्रन्थसे निरास करते हैं, यहाँ समझना चाहिए कि घटके ध्वंसके अनन्तर कपालमें जैसे घटध्वंसकी प्रतीति होती है, वैसे ही खण्डित घटके अधिकरण भूतलमें भी 'यहाँ घट ध्वस्त हुआ' इस प्रतीतिके आधारपर भूतल आदि भी घटध्वंसके अधिकरण होते हैं, ऐसा कुछ तार्किक मानते हैं, उन्हींके अनुसार यह पूर्वपक्ष है ।
† समाधानका तात्पर्य यह है कि यदि घटध्वंस भूतल आदिमें प्रत्यक्ष मानते हो, तो जहाँपर कपालोंकी कतार है, वहाँसे उस कतारको हटा देनेपर 'यहाँ घटका ध्वंस है' ऐसा प्रत्यक्ष होना चाहिए, परन्तु होता तो है नहीं, अतः ध्वंसका प्रत्यक्ष नहीं होता है, यह मानना चाहिए । यदि शङ्का हो कि घटध्वंसके प्रत्यक्षके प्रति कपालमालाका प्रत्यक्ष भी कारण है, अतः घटध्वंसका प्रत्यक्ष नहीं होता, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि तुम्हारे कथनके अनुसार कपालमालाका अपसरण न करनेपर भी मणिक (मिट्टीका बड़ा पात्र) आदि अन्य पात्रोंसे व्यावृत्त भूतलगत कपालोंमें घटके कपालोंका असाधारण रूप गृहीत जिस कालमें नहीं हुआ उस कालमें भी घटध्वंसका प्रत्यक्ष होना चाहिए, क्योंकि कपालमालाका प्रत्यक्ष विद्यमान है, अतः ध्वंस प्रत्यक्ष है, यह मत अनादरणीय है । वस्तुतस्तु प्रध्वंसाभावके प्रत्यक्षमें इन्द्रियका सन्निकर्ष निरूपित नहीं होता, अतः प्रत्यक्ष नहीं होता, यह भाव है।