सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in context५१२ : सिद्धान्तलेशसंग्रह [ चतुर्थ परिच्छेद
क्षालितेष्विव हिङ्ग्वादिपात्रेष्वन्ये तु वासना ।
कुछ लोग कहते हैं कि हिंग आदिके पात्रोंके धोनेपर भी जैसे उसकी वासना रह जाती है, वैसे ही अज्ञान की वासना का रहना ही अविद्याका लेश है ।
क्षालितलशुनभाण्डानुवृत्तलशुनवासनाकल्पोऽविद्यासंस्कार इत्यन्ये ।
‡ कुछ लोग कहते हैं कि अत्यन्त स्वच्छ किये हुए लशुनके पात्रमें अनुवर्तमान लशुनकी वासनाके समान अनुवर्तमान अविद्याकी वासना ( संस्कार ) ही अविद्याका लेश है ।
विक्षेपशक्तियुक्त अविद्या है, उसका—प्रतिबन्धकीभूत प्रारब्धकर्मके क्षीण होनेपर पूर्वमें अनावृतरूपसे अवस्थित चैतन्य ही—विनाशक है, ऐसा स्वीकार होनेसे तत्त्वज्ञानसे विक्षेपशक्तियुक्त अविद्यारूप अविद्यालेशकी निवृत्ति न होनेसे उसका विनाशक कौन है, इस प्रकारकी शङ्का ही नहीं हो सकती है, यह तात्पर्य है ।
‡ तात्पर्य यह है कि तत्त्वज्ञानसे अन्तःकरणकी उपादानभूत अविद्याकी निवृत्ति होनेपर भी अविद्याजन्य कोई देहकी अवस्थितिमें प्रयोजक वासनाविशेष रहता है, उसी वासनाविशेषको अविद्यालेश कहा जाता है । यदि इसमें शङ्का की जाय कि उपादानभूत अविद्याका नाश होनेपर कार्यका अवस्थान कैसे होगा ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जैसे अन्य मतावलम्बी पटके नाशक्षणमें पटके रूपादिककी अवस्थिति मानते हैं, वैसे ही हमारे मतमें भी उपादानके नाश होनेपर भी वासनाविशेषकी अवस्थिति माननेमें कोई हानि नहीं है। यदि शङ्का हो कि समवायिकारणका नाशरूप जो अनवस्थितिमें कारण है, उसकी प्रतीक्षासे उपादानके अभावकालमें भी रूपादिककी अवस्थिति हो सकती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि इस परिस्थितिमें तो प्रकृतमें भी तत्त्वज्ञानसे उत्पन्न देहादिके प्रति उपादानभूत अविद्याका विनाश, जो देहादिके विनाशमें कारणभूत है, प्रारब्धकर्मसे प्रतिवद्ध है, इसलिए प्रतिबन्धकरहित अविद्याके विनाशकी प्रतीक्षासे देह आदिकी भी अवस्थिति हो सकती है । यदि शङ्का हो कि प्रारब्धकर्मको प्रतिबन्धक मानना प्रमाणशून्य है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जीवन्मुक्तिप्रतिपादक शास्त्र और तत्त्ववेत्ताओंका अनुभव उसमें प्रमाण है । किञ्च, पट और उसके रूपकी एक ही क्षणमें निवृत्ति देखनेमें आती है, अतः परमतमें ही तथाविध अनियमस्वीकारमें प्रमाण नहीं है, इसीलिए विद्यारण्य स्वामीजीने कहा है कि
विना क्षोदक्षमं मानं तैर्वृथा परिकल्प्यते ।
श्रुतियुक्त्यनुभूतिभ्यो वदतां किं नु दुःशकम् ॥
: अर्थात् अन्यमतावलम्बी किसी प्रमाणविशेषके बिना वृथा ही वस्तुका अङ्गीकार करते हैं, तो हम लोगोंके लिए, जो कि श्रुति, युक्ति और अनुभवके अनुसार वस्तुकी सिद्धि कहते हैं, क्या असाध्य है ।