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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

DevanagariHindipublished590 pages

Page 530 of 590

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Page 530

५०० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [तृतीय परिच्छेद]

केवलघटशब्दादिजन्यज्ञानव्यावृत्तं तदभेदज्ञानत्वम् । अतिरिक्ताभेदानि-
रूपणात् । अभावसादृश्यादीनामधिकरणप्रतियोग्यादिभिः स्वरूपसम्बन्ध-
युक्तानामधिकरणेनाऽऽधाराधेयभावरूपः स्वरूपसम्बन्धविशेषः प्रतियोगिना
प्रतियोग्यनुयोगिभावरूप इत्यादिप्रकारेण स्वरूपसम्बन्धे अवान्तरविशेष-
कल्पनावद् वृत्तीनां विषयेऽपि संयोगतादात्म्ययोरतिप्रसक्त्या विषयैर्विषय-


स्वरूपसम्बन्धविशेषसे घटादिविषयकत्व ही केवल घटशब्द आदिसे होनेवाले ज्ञानसे भिन्न घटाभेदविषयक ज्ञानत्व है, क्योंकि अतिरिक्त अभेदका निरूपण नहीं हो सकता है । और × अभाव एवं सादृश्य आदिका, जो कि अधिकरण और प्रतियोगी आदिके साथ स्वरूपसम्बन्धसे युक्त हैं, अधिकरणके साथ आधाराधेयभावरूप स्वरूपसम्बन्धविशेष है और प्रतियोगीके साथ प्रतियोग्यनुयोगिभावरूप स्वरूपसम्बन्धविशेष है, इस प्रकारसे जैसे स्वरूपसम्बन्धमें अवान्तर भेदोंकी कल्पना की जाती है, वैसे ही वृत्तियोंके विषयीभूत निर्विशेष-चैतन्यमें भी संयोग ❊ और तादात्म्यसंसर्गकी अतिप्रसक्ति होनेके कारण


ज्ञानत्वमें भी वही व्यवस्था है, इसे इस ग्रन्थसे कहते हैं । तात्पर्य यह है केवल घट आदि शब्दसे जन्य ज्ञानके विषयभूत घट आदिके स्वरूपकी अपेक्षा 'सोऽयं घटः' इत्यादि वाक्यसे बोधित अभेद अतिरिक्त नहीं है, क्योंकि भिन्न माननेमें प्रमाण नहीं है, इसलिए 'घटः' और 'सोऽयं घटः' इनमें विषयप्रयुक्त वैलक्षण्यके न होनेसे 'सोऽयं घटः' इत्यादि स्थलमें भी 'तत्त्वमसि' इत्यादि वाक्यके समान 'सः' और 'अयम्' इन दो पदोंके वाक्यार्थरूप दो धर्मोंके परामर्श आदि कारणविशेषके अधीन स्वरूपसम्बन्ध विशेषसे घटादिस्वरूपविषयकत्व ही घटाद्यभेद-ज्ञानत्व होगा, दूसरा नहीं, इसीका सर्वत्र अनुसरण करना चाहिए ।

× प्रकृतमें वक्तव्य यह है कि केवल घटादिशब्दजन्य ज्ञानका भी विषयके साथ स्वरूप सम्बन्ध ही है, इस अवस्था में स्वरूप सम्बन्धको लेकर अभेद ज्ञानत्वादिकी व्यवस्था कैसे कर सकते हैं। यदि इसमें शङ्का हो कि वृत्त्यात्मक ज्ञानोंका विषयोंके साथ विषयविषयिभाव प्रयोजक स्वरूपसम्बन्धोंके साधारण होनेपर भी उनमें विषय और उनके ज्ञानके स्वरूपात्मक सम्बन्धोंमें सामग्रीविशेषके प्रभावसे परस्पर वैलक्षण्यकी कल्पनासे व्यवस्थाकी उपपत्ति कर सकते हैं, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि स्वरूपसम्बन्धोंका कहींपर भी वैलक्षण्य देखनेमें नहीं आता है, इसलिए वैसी कल्पना नहीं कर सकते हैं, इसपर 'अभाव सादृश्यं' इत्यादि ग्रन्थसे स्वरूपसंसर्गोंके भेदका उपपादन करते हैं ।

❊ तात्पर्य यह है कि यहाँ किसीको शङ्का हो कि वृत्तियोंका विषयके साथ विषयविषयिभाव स्वरूपसम्बन्धप्रयुक्त नहीं है, किन्तु संयोगादिप्रयुक्त है, अतः वृत्तियोंका विषयोंके साथ स्वरूपसम्बन्धके असिद्ध होनेसे उन सम्बन्धोंमें वैलक्षण्यात्मक विषयकी कल्पना अयुक्त है,

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