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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

DevanagariHindipublished590 pages

Page 528 of 590

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Page 528

४९८ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ तृतीय परिच्छेद


स्वरूपसंबन्धविशेषेण चैतन्यविषयत्वमेव तदभेदज्ञानत्वम् । यथा हि
त्वं पदके वाक्यार्थभूत जो जीव और ईश्वर दो धर्मी हैं, उनके परामर्श आदि कारणविशेषके अधीन स्वरूपसम्बन्धविशेषसे चैतन्यविषयकता ही


चाहिए, ऐसा ही उस पुरुषको बोध होता है। इसमें कपालांशमें कपालान्तरव्यावर्त्तकविशेषके गृहीत न होनेपर भी पुरोडाशकपालसे अतिरिक्त कपालोंमें तुषोपवापसाधनत्वकी निवृत्ति देखी जाती है, इसलिए अमाधिकविषयक ज्ञानमें भ्रमनिवर्तकत्व नियम यदि माना जाय, तो इस स्थलमें भी व्यभिचार हो सकता है। इससे 'तीरे घोषः' ( तीरमें घोष है ) इस शाब्दबोधमें गङ्गातीरत्वरूप विशेषविषयत्वके न होनेपर भी उसके हेतुभूत पदार्थोपस्थितिके समयमें गङ्गा-सम्बन्धित्वरूपसे तीरकी उपस्थिति रहनेके कारण उपस्थितिकी सामर्थ्यसे वस्तुतः गङ्गातीर-विषयक ज्ञान जो कि अमाधिकविषयक नहीं है, वह भ्रमका निवर्तक है, ऐसा कहना होगा। इसी प्रकार 'कपालसे तुषोंका उपवाप करना चाहिए' इत्यादि शाब्दबोधके स्वतः कपालान्तरकी व्यावृत्ति करनेवाले विशेषविषयक न होनेपर भी उक्त शाब्दबोधके हेतुभूत पदार्थकी उपस्थिति-कालमें पुरोडाशकी सम्बन्धितारूपसे कपालकी उपस्थिति होनेसे उपस्थितिकी सामर्थ्यसे उसके अमाधिकविषयक न होनेपर भी भ्रमनिवर्तकत्वका अङ्गीकार करना होगा, इस परिस्थितिमें ज्ञानकी भ्रमविरोधितामें सामग्रीविशेषाधीनत्व ही प्रयोजक मानना होगा, अमाधिकविषयत्व नहीं, क्योंकि उक्त स्थलमें व्यभिचार है। किञ्च, महावाक्यजन्य जो ज्ञान है, उसमें संसारके मूलभूत अज्ञानकी विरोधिता श्रुति, स्मृति और अनुभवसे सिद्ध है, महावाक्योंसे चैतन्यस्वरूप मात्रका बोध होता है, इसका द्वितीय परिच्छेदमें साधन किया जा चुका है और अन्य निबन्धोंमें विस्तार भी किया गया है, इसलिए जैसे शुक्तिरजतादिस्थलमें भ्रमविरोधी अमाधिकविषयक शुक्तिज्ञानादिमें अमाधिकविषयता है, वैसे ही दोषाभाव आदिसे घटित सामग्रीविशेषाधीनत्वसे, अखण्डार्थक वेदान्तके अनुसारसे और पूर्वके उदाहृत व्यभिचार-स्थलोंके अनुरोधसे भी ज्ञानकी भ्रमविरोधितामें सामग्रीविशेषाधीनत्व को ही अनुगत प्रयोजक कहना होगा, अमाधिकविषयत्वका अङ्गीकार करके अमाधिकविषयकत्वसे रहित महावाक्यार्थ ज्ञान भ्रमनिवर्तक नहीं हो सकता है, इसी अभिप्रायसे 'किन्तु' इत्यादि ग्रन्थ है, तात्पर्य यह है कि 'तत्' और त्वम् शब्दके वाच्यभूत जो ईश्वर और जीव दो धर्मी हैं, उन दो धर्मियोंका पहले 'तत्' और 'त्वम्' शब्दसे शक्तिवृत्तिसे स्मृतिरूप परामर्श होता है, उसके बाद तत् और त्वम्पदके सामानाधिकरण्यसे जीव ईश्वरसे अभिन्न है, इस प्रकार उनकी (जीव और ईश्वरकी) विशेषण और विशेष्यभावसे अवगति होती है, अनन्तर 'तत्' और 'त्वम्' पदसे वाच्य अर्थभूत जो विशिष्ट हैं उनमें से विशेष्यरूप अभेदके योग्य जो चैतन्य हैं। उनकी लक्षणासे प्रतीति होती है, इसके बाद दोनों विशेष्यके अभेदको विषय करनेवाले शाब्दबोधका उदय होता है। इस क्रमसे होनेवाला महावाक्यजन्य ज्ञानका अपने विषयके साथ जो स्वरूप-सम्बन्ध है, उस सम्बन्धसे चैतन्यविषयत्व ही घटादिज्ञानव्यावृत्त वाक्यजन्य जीव और ब्रह्मका अभेदज्ञान है, इसके बलसे वह अभेदज्ञान मूलाज्ञान और. मिथ्याज्ञानका विरोधी होता है।

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