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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 502 of 590

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Page 502
४७२सिद्धान्तलेशसंग्रह[ तृतीय परिच्छेद

महावाक्यं परे प्राहुर्मनसः प्रतिषेधतः ॥ २० ॥

कुछ लोग कहते हैं कि ब्रह्मसाक्षात्कारमें तत्त्वमस्यादि महावाक्य ही करण है, क्योंकि अनेक श्रुतियोंमें मनकी करणताका प्रतिषेध किया गया है ॥ २० ॥

अपरे तु 'तद्धास्य विजज्ञौ' 'तमसः पारं दर्शयति' 'आचार्यवान् पुरुषो वेद तस्य तावदेव चिरम्' इत्यादिश्रुतिषु आचार्योपदेशानन्तरमेव ब्रह्मसाक्षात्कारोदये, जीवन्मुक्तिश्रवणाद्, 'वेदान्तविज्ञानसुनिश्चिताथाः' इति ज्ञानान्तरनैराकाङ्क्ष्यश्रवणात्, 'तं त्वौपनिषदं पुरुषम्' इति ब्रह्मण उपनिषदेकगम्यत्वश्रवणाच्च औपनिषदं महावाक्यमेव ब्रह्मसाक्षात्कारे


कुछ लोग कहते हैं कि 'तद्धास्य विजज्ञौ' (उसने पिताके उपदेशसे उस ब्रह्मका साक्षात्कार किया) 'तमसः पारं दर्शयति०' (अविद्याके अधिष्ठानभूत ब्रह्मको दिखलाता है) 'आचार्यवान्०' (आचार्यवाला पुरुष जानता है, विद्वान्‌की विदेह मुक्तिमें तबतक ही देर है, जबतक प्रारब्धसे वह मुक्त नहीं होता है) इत्यादि अनेक श्रुतियोंमें आचार्यके उपदेशके बाद ही ब्रह्मसाक्षात्कारका उदय होनेपर, जीवन्मुक्तिका श्रवण है, इसलिए और 'वेदान्तविज्ञान०' * (वेदान्त वाक्योंके ज्ञानसे ही जिन्हें अर्थ निश्चित हो गया है) इससे ज्ञानके बाद किसी आकाङ्क्षाके न होनेसे एवं 'तन्त्वौपनिषदं पुरुषम्' (उस उपनिषत्प्रमाणगम्य पुरुषको) इस श्रुतिसे ब्रह्मके उपनिषत्प्रमाणगम्यत्वके श्रवणसे [यही निश्चित होता है] ब्रह्मके साक्षात्कारके प्रति उपनिषत्के महावाक्य ही † करण हैं, मन


इसलिए ध्यानसे लब्ध चित्तकी एकाग्रतासे उस आत्माको देखता है, यह इस श्रुतिका तात्पर्य है।

* जिन लोगोंके मतसे महावाक्य ही ब्रह्म-साक्षात्कारके प्रति कारण है, उनका मत इस ग्रन्थसे दिखलाया जाता है।

प्रकृत श्रुतिसे वेदान्तवाक्यजन्य ज्ञानसे ही ब्रह्मात्मैक्यरूप अर्थका निश्चय होता है, ऐसा कहनेसे वाक्यार्थज्ञानके बाद प्रसङ्ख्यानका अनुष्ठान अपेक्षित नहीं है, यह प्रतीत होता है, इसकी तभी उपपत्ति हो सकती है जब कि वाक्यसे ही अपरोक्ष ज्ञानकी उत्पत्ति मानी जाय, इससे 'वेदान्तविज्ञान' इत्यादि श्रुतिसे वाक्य ही अपरोक्षज्ञानमें करणत्वरूपसे निश्चित होता है, यह भाव है।

† सांख्य और योगमार्गके अनुष्ठानसे दृष्ट और अदृष्टरूप सकल प्रतिबन्धकका विनाश होनेपर प्रतिबन्धकसे रहित वाक्य ही साक्षात्कारको उत्पन्न करता है, इसलिए वाक्यके करणत्व-पक्षमें सांख्य और योगमार्गकी वैयर्थ्यशङ्का नहीं हो सकती है, यह भाव है।

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