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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

DevanagariHindipublished590 pages

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[ ३ ]

चार्य' अर्थात् एक सौ चार ग्रन्थोंके निर्माण करनेवाले आचार्य, यह उपाधि लगी हुई कहीं-कहींपर मिलती है ।

अस्तु जो कुछ हो, परन्तु इतना तो निर्विवाद सिद्ध होता है कि दीक्षित-जीका सब शास्त्रोंमें अप्रतिहत पाण्डित्य और उनकी प्रतिपादनशैली विलक्षण ही थी । ये परम आस्तिक थे । इनका गोत्र भारद्वाज था । ये * ७२ वर्षकी दीर्घ आयु तक जीवित रहे । शायद इतनी बड़ी आयुवाले पण्डित संसारमें अल्प ही हुए हैं ।

इतिहासप्रेमियोंके लिए इतनी ही सामग्री छोड़कर अब अन्य प्रकृतो-पयोगी विचार करते हैं—

सिद्धान्तलेशसंग्रह वेदान्तदर्शनका एक बड़ा उपयोगी ग्रन्थ है, क्योंकि इसके यथावत् अध्ययन करनेपर अद्वैतवेदान्तशास्त्रका ऐसा कोई भी मत अज्ञात नहीं रह जाता है, जो इसमें न आया हो । इस ग्रन्थमें ग्रन्थकारने जिन-जिन मतोंका सङ्ग्रह किया है, उनका आगे जाकर दिग्दर्शन करायेंगे । इसके पहले यह बतलानेकी चेष्टा करते हैं कि दर्शनशब्दका क्या अर्थ है, वे कितने हैं, और उनकी क्या आवश्यकता है ।

यद्यपि दर्शनशब्दके प्रकरणानुसार अनेक अर्थ होते हैं, और उनका कोषोंमें निरूपण भी मिलता है †, तथापि जहां शास्त्रशब्दके ‡ साथ दर्शनशब्द आता


कुवलयानन्द, चित्रमीमांसा, वृत्तिवार्तिक, नामसंग्रहरत्नमाला, और इसकी व्याख्या, नक्षत्रवादावली, प्राकृतचन्द्रिका, चित्रपुट, विधिरसायन, सुखोपयोजनी, उपक्रमपराक्रम, परिमल, न्यायरक्षामणि, सिद्धान्तलेशसंग्रह, मतसारार्थसंग्रह, नयमञ्जरी, न्यायमुक्तावली, नयमयूखमालिका, शिवार्चनमणिदीपिका, मणिमालिका, रत्नत्रयपरीक्षा, शिखरिणीमाला, शिवतत्त्वविवेक, ब्रह्मतर्कस्तव, शिवकर्णामृत, रामायणतात्पर्यसंग्रह, भारततात्पर्यसंग्रह, शिवाद्धैतनिर्णय, शिवार्चनचन्द्रिका, बालचन्द्रिका, शिवध्यानपद्धति, आदित्यस्तवरत्न, मध्वतन्त्रमुखमर्दन और मध्वमतविध्वंसन आदि ।

* इस विषयमें दीक्षितजीके भ्राताके पुत्र नीलकण्ठ द्वारा विरचित शिवलीलाणर्वके प्रथम सर्गमें एक श्लोक प्रमाणरूपसे मिलता है—

फुल्लेन शम्भुः किल तावताऽपि कलाश्चतुष्षष्टिमताः प्रणिन्थे ।
द्वासप्ततिं प्राप्य समाः प्रबन्धाञ्छतं व्यधादप्पयदीक्षितेन्दुः ॥

और इसी प्रमाणसे दीक्षितजीने सौ ग्रन्थ बनाये हैं, यह भी साबित होता है ।

† जैसे नेत्र, स्वप्न, बुद्धि, धर्म, दर्पण आदि ।

‡ शास्त्रशब्दका लक्षण यों मिलता है—प्रवृत्तिन्न निवृत्तिन्न नित्येन कृतकेन वा । पुंसां