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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 415 of 590

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Page 415

जीवोपाधिभेद-विचार ] भाषानुवादसहित ३८५


अन्ये विशिष्टो भोक्ताऽत्र संशुद्धो मुक्तिसङ्गतः ।
आत्मेन्द्रियमनोयुक्तमित्यादिश्रुतिदर्शनात् ॥ ६१ ॥

अन्य लोग कहते हैं कि विशिष्ट आत्मा भोक्ता है और शुद्ध आत्मा मुक्तिका भागी है, क्योंकि 'आत्मेन्द्रियमनोयुक्तम्' इत्यादि श्रुति देखी जाती है ॥ ६१ ॥

अपरे तु—
'आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ।'
इति सहकारित्वेन देहेन्द्रियैः तादात्म्येन मनसा च युक्तस्य चेतनस्य भोक्तृत्वश्रवणादन्तःकरणभेदेन तद्विशिष्टभेदाद् व्यवस्था । न चैवं विशिष्टस्य बन्धः, शुद्धस्य मोक्ष इति वैयधिकरण्यम्, विशिष्टगतस्य बन्धस्य विशेष्येऽनन्वयाभावाद् विशिष्टस्यानतिरेकादित्याहुः ।

कोई लोग कहते हैं कि * 'आत्मेन्द्रिय०' (देह, इन्द्रिय और अन्तःकरणसे युक्त चैतन्य भोक्ता है, ऐसा विद्वान् लोग कहते हैं) इस प्रकारकी श्रुतिसे यही ज्ञात होता है कि सहकारित्वरूपसे देह और इन्द्रियोंसे युक्त तथा तादात्म्यरूपसे अन्तःकरणसे युक्त चैतन्य ही भोक्ता है, इससे अन्तःकरणके भेदसे ही अन्तःकरणविशिष्ट चेतनका भेद होनेसे सुखित्व, दुःखित्व आदिकी व्यवस्था होती है । इसमें यदि शङ्का हो कि विशिष्टमें † बन्ध है और शुद्धमें मोक्ष है, इसलिए संसार और मोक्षका वैयधिकरण्य ही है तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि विशिष्टमें रहनेवाला बन्ध विशेष्यमें अन्वित होता है, क्योंकि विशिष्ट विशेष्यसे भिन्न ‡ नहीं है ।


* सब शरीरोंमें यद्यपि चिदात्मा एक है, तथापि केवल वही संसारका आश्रय नहीं है, किन्तु बुद्धिविशिष्ट चिदात्मा उसका आश्रय है । और बुद्धिविशिष्ट चिदात्माके प्रतिशरीर भिन्न होनेके कारण सुख-दुःखादिका साङ्कर्य नहीं है, इस प्रकार अन्यमतवाले कहते हैं, यह भाव है ।

† शङ्काका भाव यह है कि बुद्धिविशिष्ट आत्मा केवल आत्मासे भिन्न है, क्योंकि विशिष्ट शुद्ध नहीं है, ऐसी प्रतीति होती है, कारण कि विशिष्टमें रहनेवाला शुद्धप्रतियोगिक भेद विशेष्यमें रहता है, यह नियम है, इस अवस्थामें विशिष्टात्मगत संसारका विशेष्यमें सम्बन्ध होनेपर भी मुक्तिमें अन्वित केवल चैतन्यमें संसारके न होनेसे वैयधिकरण्य तदवस्थ है ।

‡ तात्पर्य यह है कि विशिष्ट और शुद्धमें कोई भेद नहीं है, लोकमें दण्डसे युक्त पुरुषमें शुद्ध पुरुषका अभेद प्रत्यभिज्ञात होता है अर्थात् वही पुरुष है, इस प्रकार शुद्ध पुरुषका अवगाहन करनेवाली प्रत्यभिज्ञा होती है और इस प्रत्यभिज्ञामें कोई बाधक भी नहीं है, इसलिए

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