सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in contextमिथ्या पदार्थोंके अर्थक्रियाकारित्वका उपपादन-विचार] भाषानुवादसहित ३७१
अन्ये तु हेतुसत्यत्वापेक्षा नाऽर्थक्रियां प्रति ।
मरीचितोये तोयत्वजात्यभावान्न तत्क्रिया ॥ ५३ ॥
कुछ लोग कहते हैं—अर्थक्रियाके प्रति हेतुकी सत्यता अपेक्षित नहीं है, मरु-मरीचिका जलमें अर्थक्रिया इसलिए नहीं होती है कि उसमें अवगाहनादि कार्यका कारण-तावच्छेदक जलत्व जाति नहीं है ॥५३॥
अन्ये तु पानावगाहनाद्यर्थक्रियायां जलादिस्वरूपमात्रमुपयोगि, न तद्गतं सत्यत्वम् । तस्य कारणत्वतदवच्छेदकत्वयोरभावादिति किं तेन । न चैवं सति मरुमरीचिकोदकशुक्तिरजतादेरपि प्रसिद्धोदकाद्युचितार्थक्रियाकारित्वप्रसङ्गः । 'मरीचिकोदकादावुदकत्वादिविजातिर्नास्तीति तद्विषयकभ्रमस्य उदकशब्दोल्लेखित्वं तदुल्लेखिपूर्वानुभवसंस्कारजन्य-
कुछ लोग कहते हैं कि जलपान और स्नान आदि अर्थक्रियामें केवल जल आदिका स्वरूप ही अपेक्षित है, जलादिकी सत्यता अपेक्षित नहीं है, क्योंकि जलादिगत सत्यतामें न तो उक्त अर्थक्रियाकी कारणता है और न तो कारणतावच्छेदकता है, इससे उसकी सत्यताका प्रकृतमें कुछ प्रयोजन नहीं है । यदि शङ्का हो कि सत्यताको यदि कारणावच्छेदक न माना जाय, तो मरुमरीचिकोदक † और शुक्ति-रजतमें भी व्यावहारिक जलके योग्य अर्थक्रियाकारिता प्रसक्त होगी, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'मरीचिकाजल आदिमें उदकत्व आदि जाति ही नहीं है, और मरु-मरीचिका-जलविषयक भ्रममें 'यह जल है' इत्याकारक जो जलावगाही प्रत्यय होता है। वह तो उदकशब्दोल्लेखि पूर्वानुभवसे उत्पन्न होनेवाले संस्कारसे उक्त भ्रम उत्पन्न होता है—इसलिए होता है । इस प्रकारके तत्त्वशुद्धिकार आदिके मतसे मरु-मरीचिकाजल आदिमें तत्-तत् अर्थक्रियाओंके प्रति हेतुभूत ‡
† मरुभूमिमें सम्पृक्त किरणोंमें आरोपित जलको 'मरुमरीचिकोदक' कहते हैं ।
‡ व्यावहारिक जलकी पान आदि जो अर्थक्रियाएँ हैं, उनमें उदकत्व जाति प्रयोजक है, क्योंकि जलके बिना पान हो ही नहीं सकता है। इसी प्रकार प्रसिद्ध रजत आदिकी कटक, कुण्डल आदि अर्थक्रियामें भी रजतत्व आदि प्रयोजक है, क्योंकि रजतत्वादिस रहित मृत्तिका आदिसे कटक आदि नहीं हो सकते हैं, इस परिस्थितिमें प्रातिभासिक मरुमरीचिका जलमें वस्तुतः जलत्वादि अर्थक्रिया प्रयोजक धर्मोंके न रहनेसे उनसे अर्थक्रिया नहीं हो सकती है, यह भाव है ।