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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 370 of 590

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Page 370

३४० : सिद्धान्तलेशसंग्रहं [ द्वितीय परिच्छेद

निवर्त्य एवायमध्यासोऽस्तु । व्यावहारिकत्वापत्तिस्तु अविद्यातिरिक्तदोष-
जन्यत्वेन प्रत्युक्तेत्याहुः ॥ ४ ॥

सुषुप्त्याख्यं तमोऽज्ञानं तद्बीजं स्वप्नबोधयोः ।
इत्याचार्योक्तिः स्वाप्नाध्यासोऽप्येवं प्रतीयताम् ॥ २७ ॥

जो सुषुप्तिनामक अज्ञानरूप अंधकार है वह स्वप्न और जागरणका कारण है ऐसा आचार्योंका वचन है, अतएव स्वाप्न अध्यासको भी प्रातिभासिक ही समझना चाहिये ॥ २७ ॥

एवं स्वाप्नाध्यासस्याऽप्यनवच्छिन्नचैतन्ये अहङ्कारोपहितचैतन्ये वाऽवस्था-
रूपाज्ञानशून्येऽध्यासात् ।
'सुषुप्त्याख्यं तमोऽज्ञानं यद् बीजं स्वप्नबोधयोः' ।
इति आचार्याणां स्वप्नजाग्रत्प्रपञ्चयोरेकाज्ञानकार्यत्वोक्तेश्च मूलाज्ञानकार्यतया स्वोपादाननिवर्तकब्रह्मज्ञानैकबाध्यस्य अविद्याऽतिरिक्तनिद्रादिदोषजन्यतयैव प्रातिभासिकत्वमिति केचिदाहुः ।

जाग्रत्प्रबोधबाध्यत्वमन्ये स्वप्नस्य मन्वते ।
दण्डभ्रान्तेरहिभ्रान्त्या दृढयेवात्र बाधनम् ॥ २८ ॥

और लोग मानते हैं कि जैसे दृढ सर्पभ्रम से दण्डभ्रम का बाध होता है, वैसे ही स्वाप्न अध्यास का जाग्रत्-ज्ञान से बाध होता है ॥ २८ ॥


ही इस अध्यासकी निवृत्ति होती है, और इसे व्यावहारिक तो इसलिए नहीं मान सकते हैं कि यह अविद्यासे अतिरिक्त दोषसे जन्य है ॥ ४ ॥

पूर्वोक्त न्यायके अनुसार स्वप्नाध्यास भी मूलाविद्याका कार्य है, क्योंकि अहङ्कार आदिसे अनवच्छिन्न अथवा अहङ्कारसे अवच्छिन्न चैतन्यमें, जो अवस्थारूप अज्ञानसे शून्य है, अध्यास होता है और जो सुषुप्तिरूप अज्ञानाख्य अन्धकार है, वह जाग्रत् और सुषुप्तिका कारण है, इस प्रकार आचार्योंने जाग्रत् और स्वप्नप्रपञ्चको एक ही अज्ञानका कार्य कहा है, अतः अपने उपादान मूलाविद्याके निवर्तक ब्रह्मज्ञानसे ही उसकी निवृत्ति होती है और वह अविद्यातिरिक्त निद्रा आदि दोषसे जन्य है, अतः प्रातिभासिक है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ।