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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 368 of 590

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Page 368
३३८सिद्धान्तलेशसंग्रह[ द्वितीय परिच्छेद

न च प्रतिबिम्बस्य मूलाज्ञानकार्यत्वे व्यावहारिकत्वापत्तिः । अविद्यातिरिक्तदोषजन्यत्वस्य व्यावहारिकत्वप्रयोजकत्वात् । प्रकृते च तदतिरिक्तबिम्बोपाधिसन्निधानदोषसद्भावेन प्रातिभासिकत्वोपपत्तेः ।

बिम्बापसरणाध्यक्षाद्विक्षेपांशस्य बाधनम् ।
विरोधादथवा ब्रह्मज्ञानेनैवास्य बाधनम् ॥ २६ ॥

बिम्बकी सन्निधिकी निवृत्तिसे युक्त अधिष्ठानसाक्षात्कारसे विक्षेप अंश का बाध होता है, क्योंकि दोनोंका परस्पर विरोध है अथवा केवल ब्रह्मज्ञानसे ही विक्षेप अंशका नाश होता है ॥ २६ ॥

न चैवं सति बिम्बोपाधिसन्निधिनिवृत्तिसहकृतस्याप्यधिष्ठानज्ञानस्य प्रतिबिम्बाध्यासानिवर्तकत्वप्रसङ्गः, तन्मूलाज्ञाननिवर्तकत्वाभावादिति वाच्यम्, विरोधाभावात् । ब्रह्मज्ञानानिवर्तकत्वेऽपि तदुपादानक-

यदि शङ्का हो कि प्रतिबिम्बाध्यासके प्रति मूलाज्ञान उपादान माना जायगा, तो घटादिके समान वे भी व्यावहारिक होंगे, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि व्यावहारिकत्वके प्रति केवल अविद्या ही कारण होती है, और यहांपर अविद्यासे अतिरिक्त बिम्ब और उपाधिके सान्निध्य आदि दोषोंका भी कारणत्वरूपसे अवस्थान होनेसे व्यावहारिकत्वकी आपत्ति नहीं हो सकती है, किन्तु प्रातिभासिकत्वकी ही उपपत्ति हो सकती है ।

यदि पुनः शङ्का हो कि प्रतिबिम्बाध्यास मूलाज्ञानका कार्य होगा, तो बिम्ब और उपाधिके सान्निध्यकी निवृत्तिसे युक्त अधिष्ठानसाक्षात्कार भी प्रतिबिम्बाध्यासका निवर्तक नहीं हो सकेगा, क्योंकि शुक्तिरजत आदि स्थलमें केवल अधिष्ठानका साक्षात्कार ही निवर्तक देखा गया है, अतः उक्त सान्निध्यनिवृत्तिसहकृत अधिष्ठानसाक्षात्कार मूलाज्ञानका निवर्तक नहीं हो सकता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि विरोधके न होनेसे * अधिष्ठानसाक्षात्कार ब्रह्मज्ञानका निवर्तक न होनेपर भी ब्रह्मज्ञान ( मूलाज्ञान ) है उपादान


* ज्ञान और अज्ञानका वहींपर ही विरोध होता है, जहाँपर वे दोनों समानविषयक हों, इसीसे पटाज्ञानकी घटज्ञानसे निवृत्ति नहीं होती है । प्रकृतमें मूलाज्ञान ब्रह्मविषयक है, और प्रतिबिम्बाध्यासका अधिष्ठानसाक्षात्कार दर्पणावच्छिन्न चैतन्यविषयक है, अतः उनका समानविषयकत्वरूप विरोधका प्रयोजक न होनेसे विरोध नहीं है, अतः यदि उक्त अधिष्ठानके ज्ञानको ब्रह्मज्ञानका निवर्तक न माना जाय, तो भी ग्रन्थोक्तरीतिसे अधिष्ठानज्ञानमें अध्यासके निवर्तकत्वकी उपपत्ति हो सकती है, यह भाव है ।

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