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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 364 of 590

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Page 364

३३४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद

वापत्तिः । अनलकस्तूरिकादिप्रतिबिम्बस्यौष्ण्यसौरभादिराहित्यवच्छुक्तिरजतस्य द्रवीभावयोग्यताराहित्योपपत्तेः ।

अथोच्येत—'नेदं रजतम्', 'मिथ्यैव रजतमभाद्' इति सर्वसंप्रतिपन्नवाधान्न शुक्तिरजतं सत्यम्' इति । तर्हि 'दर्पणे मुखं नास्ति, मिथ्यैवात्र दर्पणे मुखमभाद्' इत्यादिसर्वसिद्धवाधात् प्रतिबिम्बमप्यसत्यमित्येव युक्तम् । तस्मादसङ्गतः प्रतिबिम्बसत्यत्ववादः ।

नन्वध्यासोऽप्ययुक्तोऽस्योपादानाज्ञानसंक्षयात् ॥ २३ ॥

प्रतिबिम्ब मिथ्या है यह कथन भी अयुक्त है क्योंकि शुक्तिरजतके समान उसके उपादान कारण अज्ञान का नाश हो गया है ॥ २३ ॥

ननु तन्मिथ्यात्ववादोऽप्ययुक्तः, शुक्तिरजत इव कस्यचिदन्वय-

सौगन्ध्य नहीं है, वैसे ही शुक्तिरजतमें द्रवीभावकी योग्यता नहीं है, इस प्रकार कह सकते हैं।

यदि कहा जाय कि 'यह रजत नहीं है' 'मिथ्या ही रजत देखा गया' इस प्रकार जगतप्रसिद्ध बाधसे शुक्तिरजत सत्य नहीं हो सकता, तो तुल्ययुक्त्या यह भी कह सकते हैं कि दर्पणमें * मिथ्या ही मुख देखा गया, इस प्रकारके सर्वजनीन बाधके अनुभवसे प्रतिबिम्ब भी असत्य हो सकता है। इसलिए प्रतिबिम्ब सत्यत्ववाद असङ्गत है।

यदि शङ्का † हो कि प्रतिबिम्बका मिथ्यात्ववाद भी युक्तिहीन ही है,


* जिस पक्षमें बिम्ब और प्रतिबिम्बका अभेद है, उस पक्षमें प्रतिबिम्बमें जो मिथ्यात्वका अनुभव होता है, वह प्रतिबिम्बत्वरूपसे प्रतिबिम्बको विषय करता है, स्वरूपतः प्रतिबिम्बको विषय नहीं करता है, यह ज्ञातव्य है। यदि शङ्का हो कि शुक्तिरजतमें जो मिथ्यात्वक अनुभव होता है, वह इदमर्थ तादात्म्यापन्नत्वरूपसे रजतको विषय करता है, स्वरूपतः रजतको विषय नहीं करता है, इस प्रकार शुक्तिरजतस्थलमें कहकर रजत और इदमर्थका तादात्म्य ही कल्पित है, रजत कल्पित नहीं है ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि शुक्तिमें अनिर्वचनीय रजतकी उत्पत्ति यदि नहीं मानी जायगी, तो रजतका प्रत्यक्ष हो ही नहीं सकता है, अतः उसकी उत्पत्ति अवश्य माननी चाहिए। उसकी उत्पत्तिमें अन्वय और व्यतिरेकसे अनिर्वचनीय अज्ञान ही कारण है, अन्य नहीं है, अतः वह मिथ्या ही हो सकता है, क्योंकि शुक्तिरजतमें सत्यत्वसाधक अनन्यथासिद्ध कोई प्रमाण नहीं है, जैसे कि बिम्ब और प्रतिबिम्बके अभेद पक्षमें प्रतिबिम्बमें सत्यत्वसाधक प्रमाण पूर्वमें है । अतः शुक्तिरजतमें मिथ्यात्वावगाही अनुभव स्वरूपतः रजतका अवगाहन करता है इससे शुक्तिरजत मिथ्या ही है, यह भाव है।

† प्रतिबिम्बाध्यासमें अज्ञान उपादान कारण नहीं है, क्योंकि दर्पण आदि अधिष्ठानोंकी