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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 362 of 590

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Page 362
३३२सिद्धान्तलेशसंग्रह[ द्वितीय परिच्छेद

घटितप्रतिबिम्बोपलम्भनिर्वाह इति व्यर्थं तत्कल्पनम् । प्रथमे तु कथमेकस्मिन्नल्पपरिमाणे युगपदसंकीर्णतया प्रतीयमानानां महापरिमाणानामनेकमुखप्रतिबिम्बानां सत्यतानिर्वाहः ? कथं च निबिडावयवानुस्यूते दर्पणे तथैवाऽवतिष्ठमाने तदन्तर्हनुनासिकाद्यनेकनिम्नोन्नतप्रदेशवतो द्रव्यान्तरस्योत्पत्तिः ? किं च सितपीतरक्ताद्यनेकवर्णादिमतः प्रतिबिम्बस्योत्पत्तौ दर्पणमध्ये स्थितं तत्सन्निहितं न तादृशं कारणमस्ति ।

यद्युच्येत—'उपाधिमध्यविश्रान्तियोग्यपरिमाणानामेव प्रतिबिम्बानां महापरिमाणज्ञानं तादृशनिम्नोन्नतादिज्ञानं च भ्रम एव । यथापूर्वं दर्पण-


आदिसे युक्त उपलभ्यमान प्रतिबिम्बका निर्वाह नहीं हो सकता है, अतः ऐसे निरर्थक द्रव्यान्तरको मानना† अयुक्त है। प्रथम पक्ष मानो, तो अल्प परिमाणवाले एक ही दर्पणमें युगपत् ( एक कालमें ) असंकीर्णरूपसे प्रतीयमान बड़े परिमाणवाले अनेक मुखप्रतिबिम्बोंमें सत्यताका निर्वाह कैसे हो सकेगा ‡ । अर्थात् सत्यताका निर्वाह नहीं हो सकेगा । और दूसरी बात यह भी है कि अत्यन्त घने अवयवोंसे अनुस्यूत दर्पण, जो ज्योंका त्यों है, उसमें हनु, नासिका आदि अनेक निम्न उन्नत प्रदेशोंसे युक्त अन्य द्रव्यकी उत्पत्ति भी कैसे हो सकती है ? किञ्च, श्वेत, पीत, रक्त आदि अनेक रङ्गोंसे युक्त प्रतिबिम्बकी उत्पत्तिमें दर्पणके भीतर स्थित, अथवा उसके समीपवर्ती कोई श्वेत आदि वर्णोंसे युक्त कारण भी नहीं है, जिससे कि उस प्रतिबिम्बात्मक द्रव्यान्तरकी उत्पत्ति भी हो सके ।

यदि कहा जाय कि दर्पण आदि उपाधियोंके बीचमें जिस परिमाणसे विश्रान्ति कर सके, ऐसे ही परिमाणसे युक्त प्रतिबिम्ब उत्पन्न होते हैं, और उनमें महापरिमाणका जो अवभास होता है और हनु, नासिका आदि जो निम्नोन्नतादि ज्ञान होता है, वह भ्रमात्मक ही है । एवं उसके अवयवोंकी अव-


† अर्थात् प्रतिबिम्बको रूपादिरहित माननेपर रूपादिमुक्त प्रतिबिम्बका जो प्रत्यक्ष होता है, उसके साथ विरोध होगा, यह भाव है।
‡ तात्पर्य यह है कि छोटे दर्पणमें एक कालमें ही अनेक बड़े बड़े असंकीर्णरूपसे प्रतीयमान प्रतिबिम्बोंके द्रव्यान्तर होनेपर भी उन्हें सत्यस्वरूप नहीं मान सकते हैं । मिथ्या माननेपर तो जैसे स्वप्नावस्थामें छोटे शरीरान्तराकाशमें बड़े बड़े रथ, गज आदिका उपलम्भ होता है, वैसे ही स्वल्प परिमाणवाले दर्पणोंमें उनकी उपपत्ति हो सकती है ।