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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 359 of 590

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Page 359

प्रतिबिम्बकी सत्यताका निराकरण-विचार ] भाषानुवादसहित ३२९


चाक्षुषत्वसंप्रतिपत्तेः । तस्मात् स्वरूपतः प्रतिमुखाध्यासपक्ष एव श्रेयान् ।

सामान्यतोऽपि संस्कारो विशेषारोपकारणम् ।
स्वप्ने तथैव वाच्यत्वादिह बिम्बानुसारिता ॥ २२ ॥

सामान्यतः संस्कार विशेषारोपमें कारण होता है, क्योंकि स्वप्नमें अदृष्टानुरोधसे पुरुषाकृति विशेषका अध्यास कहा गया है, अतः प्रकृतमें बिम्बानुसारितासे मुखाकृतिका अध्यास होगा ॥ २२ ॥

न च तत्रापि पूर्वानुभवसंस्कारदौर्घट्यम्, पुरुषसामान्यानुभवसंस्कारमात्रेण स्वप्नेष्वदृष्टचरपुरुषाध्यासवन्मुखसामान्यानुभवसंस्कारमात्रेण दर्पणेषु मुखविशेषाध्यासोपपत्तेः ।

इयांस्तु भेदः—स्वप्नेषु शुभाशुभहेत्वदृष्टानुरोधेन पुरुषाकृतिविशेषा-


संसर्गसे चाक्षुषत्व माना गया है, इसलिए स्वरूपतः प्रतिबिम्बाध्यासकी उत्पत्ति होती है, यही पक्ष अधिकारी विशेषके लिए श्रेयस्कर है।

प्रतिबिम्बाध्यास पक्षमें अध्यासके कारण संस्कारकी उत्पत्ति नहीं हो सकती है, क्योंकि अध्यस्यमान मुखके सजातीय मुखका * पूर्वमें कदापि अनुभव हुआ ही नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, कारण कि जैसे सामान्य पुरुषविषयक अनुभवसे जायमान संस्कारमात्रसे स्वप्नमें किसी समय अननुभूत पुरुषका अध्यास होता है, वैसे ही मुखके सामान्य अनुभवसे जायमान संस्कारमात्रसे दर्पणमें मुखविशेषका अध्यास हो सकता है ।

स्वप्न और प्रतिबिम्बाध्यासमें केवल इतना ही विशेष है कि स्वप्नमें शुभ और


सूर्यके आलोक आदि विषयक चाक्षुष वृत्तिसे आलोक आदिसे अवच्छिन्न चैतन्यकी अभिव्यक्तिके कालमें आलोक आदिमें अनुगत गगनसे अवच्छिन्न चैतन्यकी भी अभिव्यक्ति मानकर अभिव्यक्त गगनावच्छिन्न साक्षीमें नैल्‍य आदिका अध्यास मान कर नैल्‍य आदिसे विशिष्ट गगन साक्षीसे भासता है, यह प्रकृतमें ज्ञातव्य है।

* पहले यह जो कहा गया है कि उपाधिसे प्रतिहत नयनरश्मियोंका बिम्बके प्रति गमन न माना जाय, तो अध्यस्यमान मुखसदृश मुखविषयक अनुभवके पूर्वमें न होनेके कारण अध्यासके कारण संस्कारकी उत्पत्ति नहीं हो सकती है, अतः उपाधिसे टक्कर खाकर रश्मियां बिम्बको ग्रहण करती हैं, यह मानना चाहिए, इसका प्रकृत ग्रन्थसे खण्डन करते हैं ।

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