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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 351 of 590

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Page 351

प्रतिबिम्बकी सत्यताका निराकरण-विचार] भाषानुवादसहित ३२१


प्रतिहतानाम् । अनतिस्वच्छताम्रादिप्रतिहतानां मलिनोपाधिसम्बन्धदोषाद् मुखादिसंस्थानविशेषग्राहकत्वं साक्षात् सूर्यं प्रेप्सूनामिव उपाधिं प्राप्य निवृत्तानां न तथा सौरतेजसा प्रतिहतिरिति न प्रतिबिम्बसूर्यावलोकने साक्षात्तदवलोकने इवाऽशक्यत्वम् । जलाद्युपाधिसन्निकर्षे केषांचिदुपाधिप्रतिहतानां बिम्बप्राप्तावपि केषांचित्तदन्तर्गमनेनान्तरसिकतादिग्रहणमित्यादिकल्पनान्न कश्चिद् दोष इति ।

अद्वैतविद्याचार्यास्तु पार्श्वस्थैर्भेददर्शनात् ।
ग्रीवास्थादन्यदध्यस्तं प्रतिबिम्बमुखं विदुः ॥ २१ ॥

अद्वैतविद्याचार्य कहते हैं कि समीपस्थ मनुष्य मुख्य मुखसे प्रतिबिम्बभूत मुखका भेद देखते हैं, अतः ग्रीवास्थ मुखसे अध्यस्त प्रतिबिम्बभूत मुख भिन्न है ॥२१॥

अद्वैतविद्याकृतस्तु प्रतिबिम्बस्य मिथ्यात्वमभ्युपगच्छतां त्रिविधजीववादिनां विद्यारण्यगुरुप्रभृतीनामभिप्रायमेवमाहुः—

साक्षात् सूर्यको देखनेकी इच्छासे प्रवृत्त हुईं नयनरश्मियाँ जैसे सूर्यके तेजसे पराहत होती हैं, वैसे उपाधिके प्रति जाकर लौटी हुई नेत्रकी रश्मियाँ सूर्यके तेजसे आहत नहीं होती हैं, इसलिए साक्षात् सूर्यके अवलोकनमें जैसी कठिनाई होती है, वैसी प्रतिबिम्बित सूर्यके अवलोकनमें नहीं होती है । जल आदि उपाधिके सन्निकर्षमें कुछ नेत्रकी किरणें उपाधिसे आहत होकर बिम्बदेश तक जाती हैं, तो भी अवशिष्ट कुछ रश्मियाँ उपाधिके भीतर जाकर उसमें की बालू आदिका ग्रहण करती हैं, इत्यादि कल्पना करनेसे कुछ भी *दोष नहीं है ।

प्रतिबिम्बको मिथ्या और जीवको पारमार्थिक, व्यावहारिक और प्रातिभासिक भेदसे त्रिविध माननेवाले श्रीविद्यारण्यप्रभृतियोंका अभिप्राय अद्वैताचार्य निम्न प्रकारसे कहते हैं—


* नयनरश्मियाँ परावृत्त होकर बिम्बको ग्रहण करती हैं, यही सुरेश्वराचार्यजीका भी मत है—

‘दर्पणाभिहता दृष्टिः परावृत्य स्वमाननम् ।
व्याप्नुवत्याभिमुख्येन व्यत्यस्तं दर्शयेन्मुखम् ॥’

अर्थात् दर्पण आदि उपाधियोंसे प्रतिहत दृष्टि लौटकर अपने ग्रीवास्थ मुखको व्याप्त करती हुई विपरीत मुखका आभिमुख्यसे ग्रहण कराती है, यह भाव है ।

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