सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in context| ३१८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [द्वितीय परिच्छेद |
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न च ग्रीवास्थमुखस्याधिष्ठानस्यापरोक्ष्यासम्भवः, उपाधिप्रतिहत-नयनरश्मीनां परावृत्य बिम्बग्राहित्वनियमाभ्युपगमाल्लत्वादिवद् । तन्नियमानभ्युपगमे परमाणोः, कुड्यादिव्यवहितस्थूलस्यापि चाक्षुषप्रतिबिम्बभ्रमप्रसङ्गात् । न च 'अव्यवहितस्थूलोद्भूतरूपवत एव चाक्षुषप्रतिबिम्बभ्रमः, नान्यस्य' इति नियम इति वाच्यम्, बिम्बस्थौल्योद्भूतरूपयोः क्लृप्तेन चाक्षुषज्ञानजननेन उपयोगसम्भवे विधान्तरेणोपयोगकल्पनानु-
क्योंकि उसके ब्रह्मप्रतिबिम्ब होनेपर भी वह ब्रह्मसे अभिन्न है, यह भाव है ।
यदि शङ्का हो कि बिम्ब और प्रतिबिम्बको एक माना जायगा, तो प्रतिबिम्बका सर्वांशसे प्रत्यक्ष नहीं होगा, क्योंकि ग्रीवास्थमुखके (जो प्रतिबिम्बत्व आदिका अधिष्ठानभूत है) नयनगोलक आदिके साथ स्वकीय चक्षुका सन्निकर्ष नहीं है, परन्तु यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि उपाधिसे प्रतिहत नेत्र-रश्मियाँ निवृत्त होकर बिम्बको ही ग्रहण करती हैं, जैसे कि ऊपर चढ़ती हुई लताएँ प्रतिहत होकर पुनः नीचे आ जाती हैं, ऐसा नियम माना गया है । यदि यह नियम न माना जाय, तो परमाणु और दिवाल आदि व्यवधानग्रस्त स्थूल पदार्थोंका भी प्रतिबिम्ब प्रसक्त होगा । [तात्पर्यार्थ यह है कि प्रतिबिम्बस्थलमें नेत्रकी किरणें चक्षुगोलकमें से निकलकर दर्पण आदि स्वच्छ द्रव्यरूप उपाधिके समीप जाती हैं और उस उपाधिसे आघात खाकर पुनः वापस लौटती हैं और ग्रीवास्थ मुख और उसके अवयवोंसे संसृष्ट हो जाती हैं। इसके बाद वहीं रश्मियाँ जैसे सामनेके पदार्थोंका साक्षात्कार करती हैं, वैसे ही स्वकीयग्रीवास्थ मुखका सर्वांशसे प्रत्यक्ष करती हैं। इसपर यदि कोई शङ्का करे कि परावृत्त नयनकी रश्मियाँ गोलक द्वारा अन्तर्लीन हो जाती हैं, यह अन्यत्र कहा गया है, इससे यहांपर लौटकर वे मुखसन्निकृष्ट होकर मुखको देखती हैं, यह कल्पना गौरवग्रस्त है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि जो प्रतिबिम्बकी उत्पत्ति मानते हैं, उनको भी यह कहना होगा कि चक्षुसन्निकृष्ट पदार्थ ही बिम्ब होता है, असन्निकृष्ट नहीं, इससे उक्त नियम अवश्य मानना होगा। यदि सन्निकृष्ट बिम्ब न माना जाय, तो व्यवहित पदार्थका भी प्रतिबिम्ब-विभ्रम प्रसक्त होगा, अतः ग्रीवास्थ मुखके नयनगोलक आदिके साथ स्वचक्षुःसन्निकर्ष होनेसे प्रतिबिम्बका सर्वाशतः प्रत्यक्ष होगा। यदि