सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in context६ सिद्धान्तलेशसंग्रह [प्रथमपरिच्छेदं
द्वयोः शेषिनोरेकस्य शेषस्य वा एकस्मिञ्छेपिणि द्वयोः शेषयोर्वा नित्यप्राप्तौ शेष्यन्तरस्य शेषान्तरस्य वा निवृत्तिफलको विधिस्तृतीयः। यथा अग्निचयने—'इमामगृभ्णन्रशनामृतस्येत्यश्वाभिधानीमादत्ते' इति, यथा वा चातुर्मास्यान्तर्गतेष्टिविशेषे गृहमेधीये 'आज्यभागौ यजति' इति। अग्निचयने अश्वरशनाग्रहणम्, गर्दभरशनाग्रहणं चेति द्वयमनुष्ठेयम्।
अप्राप्तांशकी परिपूर्ति होती है—सर्वदा अवघात ही प्राप्त होता है और दूसरे नखविदलन आदिकी अर्थात् निवृत्ति होती है।]
दो शेषियोंमें—अङ्गियोंमें एक शेषकी—अङ्गकी नित्य प्राप्ति होनेपर एक शेषीकी निवृत्ति करनेवाली विधि परिसंख्याविधि है तथा एक शेषीमें दो शेषोंकी नित्य प्राप्ति होनेपर अन्य शेषकी निवृत्ति करनेवाली विधि भी परिसंख्याविधि है। जैसे अग्निचयनमें* 'इमामगृभ्णन्रशनामृतस्येत्यश्वाभिधानीमादत्ते ('इमामगृभ्णन्' इत्यादि मन्त्रसे अश्वकी रशनाका—रस्सीका ग्रहण करे) अथवा चातुर्मास्ययागके† अन्तर्गत गृहमेधीय‡ इष्टिमें 'आज्यभागौ यजति' (आज्यभाग याग करे) यह विधि है। अग्निचयनमें दोनोंका—अश्वरशनाग्रहण
* अग्निचयन नामका एक स्थण्डिल होता है। यह सोमयागका अङ्ग है। चयन—ईंटोंसे बनाया हुआ स्थलविशेष। सोमयागकी उत्तर वेदीको बढ़ाकर वहाँ ईंटोंसे चयनका निर्माण कर उसके ऊपर आहवनीय अग्निको रखकर उसमें होम किया जाता है। यह स्थण्डिल अग्निका आधार है, इसलिए उसका नाम भी अग्निचयन हुआ और उस स्थण्डिलपर किया जानेवाला यागविशेष भी अग्निचयन है, जिसका वर्णन (का० श्रौ० सू० १६।१ आदिमें) विस्तारसे है। अग्निके पांच भेद हैं—आवहनीय, आवसथ्य, सभ्य, गार्हपत्य और दक्षिणाग्नि, इनका अग्निहोत्र आदिमें उपयोग होता है।
† चातुर्मास्य नामके याग हैं, ये याग चार मासोंमें अनुष्ठित होते हैं, अतः 'चातुर्मास्य' शब्दसे इनका व्यवहार किया जाता है। इसमें चार पर्व होते हैं—वैश्वदेव, वरुणप्रघास, साकमेधाः और शुनासीरीय। पहला पर्व फाल्गुनकी पूर्णिमामें, दूसरा चार मास बीतनेके बाद आषाढ़की पूर्णिमामें, तीसरा कार्तिककी पूर्णिमामें और चौथा फाल्गुनकी शुक्ल प्रतिपदामें पड़ता है, इस प्रकार वारंवार अनुष्ठानका आवर्त्तन होता है।
‡ गृहमेधीय नामकी इष्टि होती है। यह चातुर्मास्यान्तर्गत साकमेधाख्यपर्वके, जो दो दिनमें निष्पन्न होता है, अनुष्ठानके पहले दिन सायंकालमें 'मरुद्भ्यो गृहमेधिभ्यः सर्वासां दुग्धे सायमोदनम्' इस वाक्यसे विहित है, इसमें गृहमेधी मरुत् देवता है, दूधमें पकाया हुआ चरु द्रव्य है और ऋषभ दक्षिणा है।