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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

DevanagariHindipublished590 pages

Page 32 of 590

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Page 32
४सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

तिस्रः खलु विधेर्विधाः—अपूर्वविधिः, नियमविधिः, परिसङ्ख्याविधिश्चेति। तत्र कालत्रयेऽपि कथमप्यप्राप्तस्य प्राप्तिफलको विधिराद्यः, यथा 'व्रीहीन् प्रोक्षति' इति। नाऽत्र व्रीहीणां प्रोक्षणस्य संस्कारकर्मणो विना नियोगं मानान्तरेण कथमपि प्राप्तिरस्ति।

पक्षप्राप्तस्याऽप्राप्तांशपरिपूरणफलको विधिर्द्वितीयः। यथा 'व्रीहीन-


विधिके तीन भेद होते हैं—अपूर्वविधि, नियमविधि और परिसंख्याविधि। इन तीनोंमें से—[ दृष्ट या अदृष्ट अर्थके लिए ] तीनों कालोंमें किसी भी प्रमाणसे जो प्राप्त नहीं है, उसकी प्राप्ति करानेवाली विधि अपूर्वविधि है। जैसे 'व्रीहीन् प्रोक्षति' (व्रीहियोंका—धानोंका प्रोक्षण करे) यहाँ व्रीहियोंका प्रोक्षणरूप संस्कार-कर्म विधायक श्रुतिके बिना अन्य किसी प्रमाणसे प्राप्त नहीं है। [ तात्पर्य यह है कि दर्शपूर्णमासके प्रकरणमें पुरोडाशके लिए व्रीहियोंकी—धानोंकी अपेक्षा होती है। पुरोडाशके लिए अपेक्षित धानोंका जलसे प्रोक्षण करना पड़ता है। दृष्ट या अदृष्ट किसी भी प्रयोजनके लिए अन्य प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंसे व्रीहि-प्रोक्षणकी प्राप्ति नहीं है, केवल 'व्रीहीन् प्रोक्षति' इस विधायक वाक्यसे ही उसकी प्राप्ति है, इसलिए वह विधायक शब्द अपूर्वविधि है ]।

पक्षमें जो प्राप्त है उसके अप्राप्त अंशकी परिपूर्ति करनेवाली विधि नियमविधि कहलाती है। [ अपूर्वविधिसे नियमविधिमें यह विशेषता है कि नियमविधिमें श्रुतिके बिना भी अन्य प्रमाणसे एक पक्षमें क्रिया प्राप्त होती है। जब एक वस्तुमें एक क्रिया की जायगी, तब उस कालमें उसमें अन्य क्रिया नहीं की जा सकती, क्योंकि एक कालमें एक वस्तुमें दो क्रियाएँ नहीं हो सकतीं हैं, इसलिए पक्षान्तरमें ही भिन्न-भिन्न क्रियाएँ होंगी, जैसे चावल निकालनेके लिए जिस क्षणमें धान मूसलसे कूटे जाते हैं, उस क्षणमें नखोंसे उनका विदारण नहीं कर सकते और जिस क्षणमें नखोंसे विदारण किया जाय, उस क्षणमें कूटना नहीं बन सकता। इसलिए अन्य-अन्य पक्षमें ही उन क्रियाओंकी प्रसक्ति है। दर्शपूर्णमासमें आये हुए पुरोडाशके लिए धानोंका छिलका अवश्य निकालना पड़ेगा, अन्यथा पुरोडाश ही नहीं बन सकेगा। अतः अर्थापत्तिरूप प्रमाणसे अवघात आदिकी विधायक श्रुतिके बिना भी प्राप्ति है। अपूर्वविधिमें ऐसा नहीं है।


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