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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 311 of 590

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Page 311

प्रत्यक्षसे श्रुतिका प्राबल्य-विचार] भाषानुवादसहित २८१

न श्रुतिमात्रम् । मन्त्रार्थवादानां तु स्तुतिद्वारभूतेऽर्थे वाक्यार्थद्वारभूते पदार्थे इव न तात्पर्यम् । तात्पर्याभावे मानान्तराविरुद्धदेवताविग्रहादिकं न तेभ्यः सिध्येत् । तात्पर्यवत्येव शब्दस्य प्रामाण्यनियमादिति चेत्, न;

द्वारभूत अर्थमें अर्थात् विधान करनेके लिए अभीष्ट अर्थोंकी स्तुति आदिके द्वारभूत † अर्थमें वाक्यार्थके द्वारभूत पदार्थके समान तात्पर्य नहीं होता है । यदि ‡ शङ्का हो कि मन्त्र और अर्थवादोंका स्वार्थके प्रतिपादनमें अगर तात्पर्य नहीं है, तो मानान्तरसे (प्रत्यक्ष आदि अन्य प्रमाणोंसे) अविरुद्ध देवताओंके शरीर आदिकी उन वाक्योंसे सिद्धि नहीं होगी ? क्योंकि तात्पर्यविषय अर्थमें ही शब्दका (श्रुतिका) प्रामाण्य है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि


† मन्त्रादिका स्वार्थमें, फल न होनेसे और गौरव होनेसे, तात्पर्य नहीं है, इसलिए 'देवस्य त्वा' इत्यादि मन्त्रोंकी और 'यजमानः प्रस्तरः' इत्यादि अर्थवादोंकी विधेयगत स्तुतिमें ही लक्षणावृत्तिका आश्रयण करना चाहिए । इस अवस्थामें द्रव्यदेवतादिरूप मन्त्र आदि वाक्यार्थोका लक्षणायोग्य स्तुतिके साथ सम्बन्ध करना चाहिए, इसलिए स्तुतिमें लक्षणाका मन्त्र आदिका अर्थ द्वारभूत है, जैसे कि गङ्गापदकी तीररूप अर्थमें जो लक्षणा है उसमें प्रवाहरूप अर्थ द्वारभूत है अथवा वाक्यार्थके तात्पर्यसे प्रयुक्त पदोंका वाक्यार्थके ज्ञानमें द्वारभूत स्मारित पदोंका अर्थ द्वार है, परन्तु गङ्गाशब्दका तात्पर्य प्रवाहमें नहीं है और वाक्योंका तात्पर्य स्मारित पदार्थोंमें नहीं है, वैसे ही मन्त्र आदिका भी स्तुतिके द्वारभूत स्वार्थोंमें तात्पर्य नहीं है, इससे तात्पर्यरहित मन्त्रवाक्योंका प्रत्यक्षप्रमाणके अनुकूल ही अर्थ करना चाहिए, यह भाव है ।

‡ शङ्काका तात्पर्य यह है कि यदि मन्त्र, अर्थवाद आदिका स्वार्थमें तात्पर्य न माना जाय, तो देवताओंके शरीरोंको बतलानेवाले 'वज्रहस्तः पुरन्दरः' (वज्र है हाथमें जिसके, ऐसे पुरन्दर) इत्यादि अर्थवादोंका देवताके विग्रह आदि स्वार्थमें तात्पर्य न होनेके कारण देवताओंके शरीरका ज्ञान उन वाक्योंसे नहीं होता, क्योंकि वेदतात्पर्यविषयत्व वेदजन्य-यथार्थज्ञानविषयत्वके प्रति व्यापक है अर्थात् जहां जहां वेदजन्य यथार्थ ज्ञानकी विषयता रहेगी, वहां वहां वेदकी तात्पर्यविषयता अवश्य रहेगी, प्रकृतमें वेदके तात्पर्यकी विषयता नहीं है, अतः देवताके शरीरमें भी वेदजन्य यथार्थ ज्ञानकी विषयता नहीं रहेगी, क्योंकि व्यापकके अभावसे व्याप्यके अभावका ज्ञान होता है, इस अवस्थामें तात्पर्यवती ही श्रुति प्रमाण है, इस नियमके होनेसे 'वज्रहस्तः' इत्यादि वाक्यसे बोधित इन्द्रका शरीर सिद्ध नहीं होगा ।

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