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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

DevanagariHindipublished590 pages

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Page 3

'भूमिका'

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कुछ लिखनेके पहले उन श्रद्धेय महानुभावोंको मैं कदापि नहीं भूल सकता हूँ, जिन्होंने इस ग्रन्थके अनुवादकी आशातीत सफलताके लिए अनेक कष्टोंको सहकर परिश्रम किया है और उपयोगी सलाह देते रहे हैं। यदि उनकी सलाह न होती तो ऐसे क्लिष्ट ग्रन्थका अनुवाद होना प्रायः असम्भव ही था;. वे महानुभाव हैं—श्रद्धेय वयोवृद्ध पू० पं० चण्डिप्रसाद शुक्लजी और मान्यवर श्रद्धेय पं० श्रीकृष्ण पन्तजी ।

सिद्धान्तलेशसंग्रहके प्रणेता पण्डित अप्पय्यदीक्षित उन महान् पण्डितोंमें थे, जिनका नाम आज तक विद्वत्समुदायमें बड़े गौरव और श्रद्धासे लिया जाता है, इन्होंने अपनी लेखनीसे ऐसे-ऐसे अनेक ग्रन्थ लिख डाले हैं, जिन्हें देखकर सरस विद्वानोंका मस्तक अपने-आप उनके चरणोंमें झुक जाता है ।

इतिहासज्ञोंने ई० १५२० से १५९३ तक इनका जीवनकाल निश्चित * किया है। पं० अप्पय्यदीक्षितका जन्म काञ्चीके आस-पास 'अडप्पल्ल' गाँवमें हुआ था, अभी तक उनके कुछ वंशज उस प्रान्तमें विद्यमान हैं। अप्पय्य-दीक्षितके पितामहका नाम आचार्यदीक्षित था, क्योंकि उन्होंने न्यायरक्षामणि ग्रन्थमें † पितामहका नामग्रहण करके नमस्कार किया है । इनका


* यद्यपि इस विषयमें कुछ मतभेद है अर्थात् कुछ लोग १५५०—१६२२ तक इनकी स्थितिका काल मानते हैं, तथापि तत्सम्बन्धी विचार पुरुषार्थचतुष्टयान्यतमोत्पादक न होनेके कारण प्रकृतमें अनावश्यक-सा है। और ऐतिहासिक लोग अन्य ग्रन्थोंसे भी इसका अवधारण कर सकते हैं । इसलिए मैं इसपर अधिक लिखना पसन्द नहीं करता ।

† 'आसेतुबन्धतटमा च तुषारशैलादाचार्यदीक्षित इति प्रथिताभिधानम् ।
अद्वैतचिन्तामृताम्बुधिमग्नभावमस्मत्पितामहमशेषगुरुं प्रपद्ये ॥'
इस प्रकारका श्लोक न्यायरक्षामणिमें उपलब्ध होता है ।