सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in contextप्रत्यक्षंसे अद्वैतश्रुतिका अबाधितत्व विचार] भाषानुवादसहित २६९
जडेष्वावरणायोगाच्चक्षुरादेर्न तात्त्विकी।
मानतेत्यविरुद्धत्वं संक्षेपाचार्यदर्शने ॥ ४ ॥
घटादि जड़ पदार्थोंमें आवरणका योग न होनेके कारण चक्षु आदिकी प्रामाणिकता तात्त्विक नहीं है, अतः प्रत्यक्षसे श्रुतिप्रतिपादित अद्वैतका विरोध नहीं है, ऐसा संक्षेपशारीरककार कहते हैं ॥ ४ ॥
संक्षेपशारीरकाचार्यास्त्वाहुः—प्रत्यक्षस्य घटादिसत्त्वग्राहित्वेऽपि पराग्विषयस्य प्रत्यक्षादेस्तत्त्वावेदकत्वलक्षणप्रामाण्याभावाद् न तद्विरोधेनाऽद्वैत-
आचार्य संक्षेपशारीरककार कहते हैं कि यद्यपि घट आदि पदार्थकी सत्ताका प्रत्यक्षसे ग्रहण होता है, तथापि जड़मात्र वस्तुको विषय करनेवाले प्रत्यक्ष आदिमें तत्त्वावेदकत्वरूप ꙳ प्रामाण्यके न रहनेसे प्रत्यक्षादिके विरोधसे
꙳ प्रमाणका लक्षण है—तत्त्वावेदकत्व, तत्त्वशब्दार्थ है—अनधिगत होकर जो अबाधित हो, इस तत्त्व वस्तुका आवेदक—बोधक जो प्रमाण होगा, वही प्रमाण कहलावेगा । प्रत्यक्ष आदि जो हैं, वे तत्त्वावेदक याने अज्ञात और अबाधित वस्तुके बोधक नहीं हैं, क्योंकि प्रत्यक्ष आदि घटादि बाह्य वस्तुओंको ही विषय करते हैं, घटादि बाह्य वस्तु अज्ञात (अनधिगत—भावरूप अज्ञानके विषय) नहीं हैं। क्योंकि घटादि बाह्य वस्तुके अबाधित होनेपर भी उसके अज्ञातत्वमें कोई भी प्रमाण नहीं है। इस अर्थका प्रतिपादन करनेके लिए संक्षेपशारीरककारने कहा है—
'अज्ञातमर्थमवबोधयदेव मानं
तच्च प्रकाशकरणक्षममित्यभिज्ञाः ।
न प्रत्यगात्मविषयादपरस्य तच्च
मानस्य संभवति कस्यचिदत्र युक्त्या ॥ ८ ॥
अज्ञातमर्थमवबोधयितुं न शक्त-
मेयं प्रमाणमखिलं जडवस्तुनिष्ठम् ।
किन्त्वप्रबुद्ध पुरुषं व्यवहारकाले
संश्रित्य यंजनयति व्यवहारमात्रम् ॥ २१ ॥'
अर्थात् अज्ञात अर्थका अवबोधक प्रमाण ही अपने विषयको प्रकाशित करनेमें समर्थ होता है, ऐसा बड़े-बड़े तन्त्रकारोंका मत है, इसलिए अज्ञातार्थ बोधकत्वरूप प्रामाण्य आत्मविषयक प्रमाणसे भिन्न प्रत्यक्षादिमें युक्तिपूर्वक विचारनेसे भी नहीं हो सकता है। इस रीतिसे प्रत्यक्षादि प्रमाण अज्ञात वस्तुका यद्यपि बोध नहीं कराते हैं, तथापि अज्ञानी पुरुषका अवलम्बन करके व्यवहारकालमें व्यवहारमात्रकी उपपत्ति कराते हैं। इस विषयमें अधिक विचार संक्षेपशारीरकके द्वितीय अध्यायके ८वें श्लोकमें किया गया है, अतः वहींसे अधिक युक्तियोंका अनुसन्धान करना चाहिए, विस्तारके भयसे उसका प्रकृतस्थलमें विचार नहीं किया जाता है।