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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 293 of 590

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Page 293

प्रत्यक्षसे अद्वैतश्रुतिके अबाधितत्वका विचार] भाषानुवादसहित २६३


ॐ
नमः परमात्मने
द्वितीय परिच्छेद

ननूपजीव्यप्रत्यक्षाविरुद्धं श्रुतियुक्तिभिः ।
बोध्यते कथमद्वैतम्,

यहाँपर शङ्का होती है कि सभी प्रमाणोंके उपजीव्य—कारण—प्रत्यक्षप्रमाणसे विरोध होनेके कारण श्रुति और युक्तियोंसे अद्वैतका बोध कैसे हो सकता है ?

अथ कथमद्वितीये ब्रह्मणि वेदान्तानां समन्वयः, प्रत्यक्षादिविरोधाद् ? इति चेन्, न; आरम्भणाधिकरणो- ( उ० मी० अ० २ पा० १ अधि० ६ सू० १४ )-दाहृतश्रुतियुक्तिभिः प्रत्यक्षाद्यधिगम्यस्य प्रपञ्चस्य ब्रह्मविवर्त-तया मिथ्यात्वावगमात् । ननु न श्रुतियुक्तिभिः प्रपञ्चस्य मिथ्यात्वं

* यहां पर शङ्का होती है कि वेदान्तवाक्योंका तात्पर्य अद्वैत ब्रह्ममें कैसे हो सकता है ? क्योंकि प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंसे विरोध है, [ अर्थात् ब्रह्माभिन्न घटादि-प्रपञ्चके प्रत्यक्ष आदिसे सिद्ध होनेके कारण ब्रह्ममें अद्वितीयत्व बाधित है, अतः श्रुतिका बाधित अर्थमें तात्पर्य माना जायगा, तो अप्रामाण्य प्रसक्त होगा, इसलिए वेदान्तवाक्योंका तात्पर्य अद्वितीय ब्रह्ममें नहीं हो सकता है, यह शङ्काका भाव है ], नहीं, यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि आरम्भणा-धिकरणमें उदाहृत श्रुति और युक्तियोंसे प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंसे गृहीत पदार्थोंके ब्रह्मविवर्त होनेसे उनमें मिथ्यात्वका ही अनुमान होता है। यदि शङ्का हो कि श्रुति और युक्तियोंसे प्रपञ्चमें मिथ्यात्वका साधन ही


* प्रथमपरिच्छेदमें ब्रह्मलक्षणविचारके प्रसङ्गमें, मतभेदसे ज्ञेय ब्रह्ममें लक्षणकी वृत्तिता है और ईश्वररूप ब्रह्ममें भी है, ऐसा निरूपण करनेसे 'तत्त्वमसि' इस महावाक्यके 'तत्' शब्दके लक्ष्य और वाच्य अर्थका निरूपण किया गया है। उसके बाद जीव और जीव-साक्षीके निरूपणसे 'त्वम्' पदके वाच्यार्थ और लक्ष्यार्थका भी विवेचन किया गया है, और इनके निरूपणसे अभेदरूप वाक्यार्थका भी अर्थात् निरूपण किया गया है, इसलिए प्रथम परिच्छेदमें जीवाभिन्न निर्विशेष ब्रह्ममें वेदान्तसमन्वयरूप प्रथमाध्यायार्थका तात्पर्य निरूपण हो जाता है। अब द्वितीयाध्यायार्थरूप वेदान्तसमन्वयका मानान्तरसे विरोधके परिहारका निरूपण करनेके लिए द्वितीय परिच्छेदका आरम्भ करते हैं—"अथ" इत्यादिसे, यह भाव है।

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