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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 291 of 590

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Page 291

वृत्तिके निर्गमनकी आवश्यकताका विचार] भाषानुवादसहित २६१

दृष्टमिति दृष्टान्तानुरोधाद् वृत्तिनिर्गमः सिद्ध्यतीत्याहुः ।

केचित्तु—आवरणाभिभवार्थं वृत्तिनिर्गमानपेक्षायामपि चिदुपरागार्थं प्रमातृचैतन्यस्य विषयप्रकाशकब्रह्मचैतन्याभेदाभिव्यक्त्यर्थं वा तदपेक्षेत्याहुः ।

अभेदो जीवपरयोः सिद्धो वेदान्तमानकः ।
यतोऽत्र सर्ववेदान्तास्तात्पर्येण समन्वियुः ॥१२२॥

जीव और ब्रह्मका अभेद वेदान्तप्रमाणसे सिद्ध है, क्योंकि सभी वेदान्तोंका तात्पर्य अद्वैत ब्रह्मके बोधनमें ही है ॥१२२॥

इति श्रीमद्गङ्गाधरसरस्वतीविरचितवेदान्तसिद्धान्तसूक्तिमञ्जर्यां प्रथमपरिच्छेदः समाप्तः ।

अथ किं प्रमाणकोऽयं जीवब्रह्मणोरभेदः, यो वृत्त्याऽभिव्यज्यते ?


अन्धकारका निवर्तक देखा गया है, इसलिए दृष्टान्तके अनुसार वृत्तिका निर्गम सिद्ध होता है *।

कोई लोग कहते हैं कि यद्यपि आवरणके अभिभवके लिए वृत्तिके निर्गमनकी अपेक्षा नहीं है, तथापि चैतन्यके साथ सम्बन्धके लिए अथवा प्रमातृ-चैतन्य और विषयप्रकाशक ब्रह्मचैतन्यकी अभेदाभिव्यक्तिके लिए उसकी (वृत्तिनिर्गमकी) अपेक्षा है† ।

अब शङ्का होती है कि जीव और ब्रह्मके अभेदमें क्या प्रमाण है, जो वृत्तिसे अभिव्यक्त होता है।


* भाव यह है कि लोकमें दूसरे देशके प्रकाशसे दूसरे देशके अन्धकारकी निवृत्ति नहीं होती है, किन्तु समानदेशमें ही स्थित अंधकार और प्रकाशका परस्पर निवर्त्यनिवर्तक भाव होता है, इसी दृष्टान्तके अनुसार ज्ञान और अज्ञानका, जो कि प्रकाश और अन्धकाररूप हैं, निवर्त्य-निवर्तक भाव सामानाधिकरण्यसे ही होगा। उनका सामानाधिकरण्य अज्ञानके आश्रय विषयावच्छिन्नचैतन्यमें ही हो सकता है, अतः सामानाधिकरण्यके लिए अर्थात् विषयावच्छिन्न चैतन्यमें वृत्तिज्ञानके संसर्गके लिए वृत्तिका निर्गमन मानना ही चाहिए ।

† यदि विषयचैतन्यगत अज्ञानकी निवृत्तिके लिए वृत्तिका निर्गमन न भी माना जाय, तो भी वृत्तिका निर्गम मानना चाहिए, इस अभिप्रायसे 'केचित्तु'का मत है ।