सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in context२०६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद
नन्वेवं कथमहङ्कारादीनामनुसन्धानम्, ज्ञानसूक्ष्मावस्थारूपस्य संस्कारस्य ज्ञाने सत्ययोगेन नित्येन साक्षिणा तदाधानासम्भवात् ।
शृणु यद्वृत्त्यवच्छिन्नसाक्षिणा यत् प्रकाश्यते ।
तत्संस्कारे हि सा धत्ते न त्वाकारव्यवस्थया ॥ १०२ ॥
सुनो, जिस वृत्तिसे अवच्छिन्न साक्षीसे जिस वस्तुका प्रकाश होता है, वह वृत्ति उस विषयके संस्कारको पैदा करती है, आकारव्यवस्थासे संस्कारको पैदा नहीं करती है। अर्थात् जिसके आकारमें परिणत जो वृत्ति हो, वह उसका संस्कार उत्पन्न करे, ऐसा नियम नहीं है ॥ १०२ ॥
अन्ये तु विषयाकारवृत्तिस्थानित्यसाक्षिणा ।
त्रिपुटी भासिनाऽऽधानात् संस्कारस्य स्मृतिं जगुः ॥ १०३ ॥
इतर लोग कहते हैं कि विषयाकार वृत्तिमें प्रतिफलित त्रिपुटीको प्रकाशित करनेवाले अनित्य साक्षीसे ही संस्कारके आधानसे स्मृति उत्पन्न होती है ॥ १०३ ॥
यदि अहंकार आदिके अवभासमें अन्तःकरणकी अहङ्काराद्याकार वृत्ति न मानी जाय, तो अहङ्कार आदिका स्मरण कैसे होगा ? क्योंकि ज्ञानकी सूक्ष्म अवस्थारूप संस्कारके ज्ञानके अस्तित्वमें सम्भव न होनेसे नित्य साक्षीसे संस्कारकी उत्पत्ति नहीं हो सकती है। [तात्पर्यार्थ यह है कि वस्तुका अनुभव होनेसे उस अनुभवसे संस्कार उत्पन्न होते हैं, और उसी संस्कारसे कालान्तरमें उस वस्तुका स्मरण होता है। सिद्धान्तमें अनुभवके विनाशको अर्थात् अनुभवकी सूक्ष्मावस्थाको ही संस्कार माना है, इसलिए साक्षीकी जब तक अवस्थिति रहेगी तब तक उसका विनाश—सूक्ष्मावस्था—नहीं हो सकती है, और साक्षी तो स्वयं नित्य है, अतः उसकी किसी समयमें भी सूक्ष्मावस्था या विनाश होनेवाला ही नहीं, अतः संस्कारका अभाव होनेसे अहङ्कार आदिके स्मरणका सम्भव नहीं है। आवरणाभिभवके लिए अहङ्कार आदि गोचर अन्तःकरणकी वृत्ति भले ही न हो। परन्तु स्मरणकी उपपत्तिके लिए तो अवश्य अन्तःकरणकी वृत्ति माननी ही चाहिए]।