सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in contextसाक्षीकी अनावृतताका विचार ] भाषानुवादसहित २०१
न्यतारतम्ययुक्तेष्वनेकेषु दर्पणेषु प्रतिबिम्बे सत्युपाधिमालिन्यतारतम्यात् तत्र तत्र प्रतिबिम्बे धावल्यापकर्षस्तारतम्येनाऽध्यस्यते, एवं वस्तुतो निरतिशयस्यैकस्यैव स्वरूपानन्दस्याऽन्तःकरणप्रतिबिम्बिततया साक्ष्यानन्दभावे प्राक्तनसुकृतसंपत्त्यधीनविषयविशेषसंपर्कप्रयुक्तसत्त्वोत्कर्षापकर्षरूपशुद्धितारतम्ययुक्तसुखरूपान्तःकरणवृत्तिप्रतिबिम्बिततया विषयानन्दभावे च तमोगुणरूपोपाधिमालिन्यतारतम्यदोषादपकर्षस्तारतम्येनाऽध्यस्यते इति संसारदशायां प्रकाशमानेऽप्यानन्दे अध्यस्तापकर्षतारतम्येन सातिशयत्वादतृप्तिः। विद्यो-
त्कृष्ट एक ही श्वेत रूपके—मालिन्यके तारतम्यसे युक्त अनेक दर्पणोंमें—प्रतिबिम्बित होनेपर उपाधिकी मलिनताके तारतम्यसे तत्-तत् प्रतिबिम्बमें धवलताका अपकर्ष तारतम्यसे अध्यस्त होता है, वैसे ही वस्तुतः निरतिशय एक ही स्वरूपानन्दके अन्तःकरणमें प्रतिबिम्बित होनेके कारण साक्षीरूप आनन्दभावके प्राप्त होनेपर और पूर्व पुण्यके परिपाकके अधीन विषयविशेषके सम्पर्कसे हुए सत्त्वके उत्कर्ष और अपकर्षसे शुद्धिके तारतम्यसे युक्त सुखाकार वृत्तियोंमें प्रतिबिम्बित होनेके कारण विषयानन्दत्वके प्राप्त होनेपर † तमोगुणरूप उपाधिकी मलिनताके तारतम्यदोषसे अपकर्ष भी तारतम्यसे अध्यस्त होता है। इसलिए संसारदशामें * आनन्दके प्रकाशित होनेपर भी अध्यस्त अपकर्षके तारतम्यसे
परिणामरूप वृत्तियाँ स्वरूपानन्दविषयक होंगी, तो अवश्य उत्कर्ष और अपकर्षसे युक्त होंगी, अतः उनमें पड़ा हुआ आनन्दका प्रतिबिम्ब भी उत्कृष्ट और अपकृष्ट अवश्य होगा। इसलिए संसारदशामें प्रकाशमान आनन्दके उत्कर्षापकर्षसे युक्त होनेसे सातिशय होनेके कारण तृप्ति नहीं होती है। और मुक्तिदशामें इस प्रकार सातिशयत्व न होनेसे तृप्ति ही रहती है, अतः विशेषकी उपपत्ति हो सकती है, यह तात्पर्य है।
† अन्तःकरणके सत्त्व, रज और तम स्वरूप होनेसे उसकी वृत्तिमें भी तमोगुणकी अनुवृत्ति अवश्य होगी, और उसी तमोगुणसे अपकर्षतारतम्यात्मक मालिन्यतारतम्यदोष वृत्तिनिष्ठ भी होगा, इसी दोषके बलसे सत्त्ववृत्तिके प्रतिबिम्बमें भी अर्थात् विषयानन्दमें भी तारतम्य अध्यस्त होता है, यह भाव है।
- संसारदशामें जो प्रकाशमान आनन्दमें अपकर्षतारतम्य अध्यस्त होता है, उससे वह आनन्द सातिशय होगा, इस अवस्थामें जो अत्यन्त साधारण आनन्दका अनुभव कर रहा है, वह अवश्य उत्कृष्ट आनन्दकी अभिलाषा करेगा और उसके सम्पादन करनेमें जीतोड़ यत्न करता हुआ आनन्दसाधनत्वकी भ्रान्तिसे कदाचित् दुःखके साधनोंमें भी प्रवृत्त होकर अनेक योनिमें जन्मप्रयुक्त दुःखकी—अनर्थकी—ही प्राप्ति करेगा, अतः कभी भी दुःखके निवृत्त न होनेसे उसे तृप्ति नहीं होगी, यह भाव है।
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