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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 223 of 590

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Page 223

साक्षीकी अनावृतताका विचार ] भाषानुवादसहित १९३

नन्नूक्तरूपस्य साक्षिणः चैतन्यमात्रावरकेणाऽज्ञानेनाऽऽवरणमवर्जनीय-मिति कथमावृतेनाऽविद्याहङ्कारादिभानमिति चेत् ।

अत्राहू राहुवत् केचित् तस्य स्वावृतभास्यताम् ॥ ९६ ॥

**इस विषयमें—**राहुके समान अर्थात् जैसे राहुका प्रकाश राहुसे आवृत चन्द्रमण्डलसे ही होता है, वैसे ही अविद्याका प्रकाश अविद्यासे आवृत साक्षीसे ही होता है, ऐसा भी—कुछ लोग कहते हैं ॥९६॥

राहुवदविद्या स्वावृतप्रकाशप्रकाशयेति केचित् ।

अब यह शङ्का होती है कि पूर्वोक्त लक्षणसे लक्षित साक्षी अवश्य चैतन्यमात्रको आवृतकरनेवाले अज्ञानसे आवृत होगा, अतः अज्ञानावरणसे आवृत साक्षीसे अहङ्कार आदिका भान कैसे होगा ? * अर्थात् किसी प्रकारसे भी नहीं हो सकेगा, परन्तु यह शङ्का युक्तियुक्त नहीं है, क्योंकि—

राहुके समान अविद्या स्वावृत प्रकाशसे प्रकाशित होती है, ऐसा कुछ लोग कहते हैं । [ तात्पर्य यह है कि ग्रहणके समयमें चन्द्रमण्डल राहुसे आच्छादित होता है, परन्तु उस समयमें राहुका प्रकाश चन्द्रसे ही होता है, जो कि चन्द्र राहुसे आवृत है । इसी प्रकार यद्यपि अविद्यासे साक्षी आवृत है, तथापि उस अविद्याका प्रकाश स्वावृत साक्षीसे ही होता है ] ।


* साक्षिगोचर अपरोक्ष वृत्तिसे साक्षीके आवरणका भङ्ग होनेपर आवरणसे रहित साक्षीसे अविद्या आदिका भान हो सकता है, यह नहीं कहना चाहिए, क्योंकि 'अविद्या आदिका भान केवल साक्षीसे ही होता है' इस सिद्धान्तके साथ विरोध होगा, कारण कि उनके भानमें इस प्रकार वृत्तिका अवलम्बन करनेसे साक्षीसे अतिरिक्त वृत्तिकी भी अपेक्षा हुई । दूसरी बात यह भी है कि मनमें करणत्वका भी आगे चलकर निरास किया जायगा, इससे करणके अभावसे साक्षीको अवलम्बन करनेवाली तदाकार वृत्ति भी नहीं हो सकती है । और अहङ्कार आदिकी सत्ताके कालों उनके संशय आदि नहीं होते हैं, इसलिए सदा उनका प्रकाशस्वरूप साक्षीके साथ सम्बन्ध है, यह कहना चाहिए, यदि कादाचित्क वृत्तिसे उनका भान माना जाय, तो उनके सदा भासमानत्वके साथ भी विरोध होगा, इसलिए केवल साक्षिभास्यत्व ही अहङ्कार आदिमें स्वीकार करना चाहिए, परन्तु यह नहीं हो सकता है, क्योंकि वह साक्षिचैतन्य तो अज्ञानसे आवृत है । और साक्षिरूप चैतन्यसे अन्य चैतन्यका ही अज्ञान आवरण करता है, यह भी नहीं कह सकते हैं, क्योंकि अज्ञानका सम्पूर्ण चैतन्यको आवृत करना स्वभाव है, यदि हठात् इसे नहीं माना जाय, तो साक्षि-चैतन्यसे अन्य चैतन्यमें भी आवरणका अभाव प्रसक्त होगा, यह प्रश्नका आशय है ।

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