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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 221 of 590

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Page 221

साक्षीका स्वरूप-विचार ] भाषाअनुवादसहित १९१

त्वाद्वा अप्रकाश उपपद्यते। सुषुप्तावपि सूक्ष्मरूपेणान्तःकरणसद्भावात् तदुपहितः साक्षी तदाऽप्यस्त्येव। न चान्तःकरणोपहितस्य प्रमातृत्वेन न तस्य साक्षित्वम्, सुषुप्तौ प्रमात्राभावेऽपि साक्षिसत्त्वेन तयोर्भेदश्चाऽवश्यं वक्तव्य इति वाच्यम्।

विशेषणोपाध्योर्भेदस्य सिद्धान्तसम्मतत्वेनाऽन्तःकरणविशिष्टः प्रमाता, तदुपहितः साक्षीति भेदोपपत्तेरित्याहुः ॥ १४ ॥

अविद्ययाऽऽवृतः साक्षी तेनाऽन्यस्य प्रथा कथम् ? ।

साक्षी अविद्यासे आवृत रहता है, अतः उससे अविद्या, अहंकार आदिका प्रकाश कैसे होगा ?।

अथवा पुरुषान्तरके प्रति अयोग्यत्वकी कल्पनासे अप्रकाश - प्रत्यक्षत्वका अभाव- उपपन्न होता है। सुषुप्तिमें भी सूक्ष्मरूपसे अन्तःकरणका अस्तित्व होनेसे उस अन्तःकरणसे उपहित साक्षी सुषुप्तिकालमें भी रहता ही है। यदि कोई शङ्का करे कि जो अन्तःकरणसे उपहित चैतन्य है, वह प्रमाता है, साक्षी नहीं हैं, क्योंकि सुषुप्तिमें प्रमाताके न रहनेपर भी ‡ साक्षीके रहनेसे उन दोनोंका भेद अवश्य मानना होगा, तो यह शङ्का भी युक्त नहीं है, क्योंकि विशेषण और उपाधिके भेदका सिद्धान्तमें स्वीकार होनेसे अन्तःकरणरूप विशेषणसे विशिष्ट चैतन्य प्रमाता है और अन्तःकरणसे उपहित चैतन्य साक्षी है, इस प्रकार प्रमाता और साक्षीका भेद उपपन्न $\times$ होता है ॥ १४ ॥


‡ सुषुप्तिकालमें साक्षीकी अवश्य सत्ता है, यह मानना चाहिए, क्योंकि 'त्रिषु धामसु' (तीनों अवस्थाओंमें [साक्षीकी सत्ता है]) इत्यादि श्रुतियाँ साक्षीके अस्तित्वका जाग्रत्, सुषुप्ति और स्वप्नावस्था में प्रतिपादन करती हैं। और सुषुप्तिकालमें साक्षी द्वारा अनुभूत अज्ञानका 'मैंने कुछ नहीं जाना' इत्यादि रूपसे स्मरण भी होता है। अनेक प्रमाताके प्रलयका प्रतिपादन करनेवाली अनेक श्रुतियोंके साथ विरोध होनेसे 'अहमस्वाप्सम्' (मैं सोया था) इत्यादि स्मरणको अहमर्थ प्रमाताके अंशमें अनुभव ही मानना चाहिए, सुषुप्तिमें प्रमाताकी सत्ता नहीं माननी चाहिए। इसलिए सुषुप्तिमें सत्त्व और असत्त्वरूपसे साक्षी और प्रमाताका अवश्य भेद है, अतः प्रमातासे साक्षीका अवश्य भेद मानना ही चाहिए, तथा प्रमाता और साक्षीको एकरूप माना जाय, तो साक्षीमें उदासीनत्व आदिका प्रतिपादन भी विरुद्ध होगा, यह भाव है।

अविद्योपाधिक जीवमें अन्तःकरण प्रमातृत्वका विशेषणत्वरूपसे प्रयोजक है और उपाधित्वरूपसे साक्षित्वका प्रयोजक है। इसीलिए विशिष्ट और उपहित प्रमाता एवं