Skip to content
SarvaKosh
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished590 pages

Page 217 of 590

Read in context
Page 217

साक्षीका स्वरूप-विचारं ] भाषानुवादसहित १८७


य्यन्तर्गतोऽपीदमंशः प्रतिभासतो रजतकोटिः, तथा ब्रह्मकोटिरेव साक्षी प्रतिभासतो जीवकोटिरिति जीवस्य सुखादिव्यवहारे तस्योपयोग इत्युक्तत्वाऽयमेव पक्षः समर्थितः ।

अज्ञानोपहितः कैश्चित्—

कोई लोग कहते हैं कि अविद्यारूप उपाधिसे उपहित जीव ही साक्षी है ।

केचित्तु—अविद्योपाधिको जीव एव साक्षाद् द्रष्टृत्वात् साक्षी । लोकेऽपि ह्यकर्तृत्त्वे सति द्रष्टृत्वं साक्षित्वं प्रसिद्धम् । तच्चाऽसङ्गोदासीन-


रूपसे रजतकोटिमें प्रविष्ट है, वैसे ही यद्यपि वस्तुतः ब्रह्मकोटिमें ही साक्षीका अन्तर्भाव है, तथापि प्रतिभाससे जीवकोटिमें प्रविष्ट है, अतः जीवके सुख आदि व्यवहारमें उपयोग है, ऐसा कहकर—इसी कौमुदीकारके मतका समर्थन किया गया है । [ तात्पर्यार्थ यह है कि यद्यपि 'इदं रजतम्' इस भ्रममें रजतके अभेदरूपसे इदमंशका प्रतिभास होता है, तथापि उसका रजतकोटिमें अन्तर्भाव नहीं हो सकता, क्योंकि 'नेदं रजतम्' इस बाधक ज्ञानसे रजतका केवल बाध होता है, इदमंशका नहीं । और शुक्ति-अंशमें भी उसका अन्तर्भाव नहीं हो सकता, क्योंकि ऐसा माननेसे, जैसे शुक्ति अज्ञात है, वैसे ही 'इदम्' अंशमें भी अज्ञातत्व प्रसक्त हो जायगा, इसलिए यह मानना आवश्यक है कि वस्तुस्थितिमें इदमंश शुक्तिरूप है और प्रातिभासिक-रूपसे रजतसे अभिन्न है । बस, इसी युक्तिके अनुसार साक्षीस्थलमें भी वस्तुतः साक्षी ईश्वरस्वरूप है और 'अहं सुखमनुभवामि' ( मैं सुखका अनुभव करता हूँ ) इत्यादि प्रतिभास होनेसे कल्पित तत्-तत् जीवोंके अधिष्ठानरूप सुख आदि-का अनुभवकर्ता साक्षी जीवसे अभिन्नरूपसा ज्ञात होता है । अतः जीवके सुख-आदिके व्यवहारमें सुख आदिके अनुभवकर्ता साक्षीका उपयोग है, इस प्रकार तत्त्वशुद्धिमें कहकर इसी कौमुदीके पक्षका समर्थन किया गया है ] ।

कुछ लोग कहते हैं कि अविद्यासे उपहित-अविद्याप्रतिबिम्बित-चैतन्यरूप जीव-ही साक्षात् द्रष्टा होनेसे साक्षी है, क्योंकि लोकमें भी यही प्रसिद्धि है—कर्ता न होकर जो द्रष्टा होता है, वही साक्षी कहलाता है, इस प्रकार साक्षीका लक्षण


[email protected]