सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
Page 186 of 590
Read in context१५६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद
विषयेणाऽवच्छिन्नस्य वृत्तौ प्रतिबिम्बिततया तदभेदेन तत्सम्बन्धसत्त्वादिति।
बिम्बत्वयुक्तं ब्राह्मं स्यात् जैवं तदुपलक्षितम् ।
वृत्तौ विषयचैतन्यं तदभेदं च तां परे ॥ ७१ ॥
बिम्बत्वसे युक्त ब्रह्म-चैतन्य है और बिम्बत्वसे उपलक्षित जीवचैतन्य है, वृत्तिके होनेपर जो विषयचैतन्य है, उसका अभेद ही अभेदाभिव्यक्ति है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥ ७१ ॥
अपरे त्वाहुः—बिम्बभूतविषयाधिष्ठानचैतन्यमेव साक्षादाध्यासिक-सम्बन्धलाभात् विषयप्रकाशकमिति तस्यैव बिम्बत्वविशिष्टरूपेण भेद-सद्भावेऽपि तदुपलक्षितचैतन्यात्मना एकीभावोऽभेदाभिव्यक्तिः । न चैवं सति जीवब्रह्मसाङ्कर्यम्, न वा ब्रह्मणः सर्वज्ञत्वविरोधः बिम्बात्मना तस्य यथापूर्वमवस्थानादिति ॥१२॥
आशङ्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि विषयसे अवच्छिन्न चैतन्यका ही, जो विषयका अधिष्ठानभूत चैतन्य है, वृत्तिमें प्रतिबिम्ब है, अतः उसके साथ अभेद होनेसे अधिष्ठानके साथ आध्यासिक सम्बन्ध भी है । [ भाव यह है कि विषयके आपरोक्ष्यमें आध्यासिक सम्बन्ध अर्थात् अध्याससिद्ध तादात्म्य सम्बन्ध नियामक माना गया है—इसका निर्वचन ‘एवञ्च विषयापारोक्ष्ये आध्यासिक-सम्बन्धो नियामकः इति सिद्धान्तोऽपि सङ्गच्छते’ इत्यादिसे किया गया है । अध्याससिद्धतादात्म्य अर्थात् विषयाधिष्ठानचैतन्यका विषयके साथ तादात्म्य । प्रकृतमें वृत्तिप्रतिबिम्बितचैतन्य ही अधिष्ठानचैतन्य है, अतः अध्याससिद्ध तादात्म्य सम्बन्धकी उपपत्ति हो सकती है, यह भाव है ]
कोई लोग कहते हैं कि विषयका अधिष्ठानभूत बिम्बस्वरूप ब्रह्मचैतन्य ही, साक्षात् आध्यासिक सम्बन्धका लाभ होनेसे, विषयका प्रकाशक है, इसलिए बिम्बत्वविशिष्टचैतन्यका बिम्बत्वरूपसे प्रतिबिम्बत्वविशिष्ट चैतन्यरूप जीवके साथ भेद होनेपर भी बिम्बत्व और प्रतिबिम्बत्व रूपसे उपलक्षित शुद्धचैतन्य-रूपसे जो एकीभाव है वही अभेदाभिव्यक्ति है । उपलक्षित चैतन्यरूपसे अभेदाभिव्यक्तिके माननेपर जीव और ब्रह्मका साङ्कर्य अथवा ब्रह्मके सर्वज्ञत्वका विरोध भी नहीं है, क्योंकि बिम्बरूपसे ब्रह्मकी यथापूर्व अवस्थिति है ही ॥१२॥