Skip to content
SarvaKosh
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

DevanagariHindipublished590 pages

Page 18 of 590

Read in context
Page 18

[ १६ ]

आस्तिक-दर्शनशास्त्र आत्मतत्त्वविज्ञानाख्य मोक्षके प्रतिपादनके लिए मुख्यरूपसे प्रवृत्त नहीं हुए हैं, परन्तु अन्यान्य द्रव्यादि पदार्थोंका निरूपण करनेके लिए प्रवृत्त हुए हैं। जैसे न्यायमें द्रव्यादि पदार्थोंका निरूपण, सांख्यमें प्रकृति, पुरुष और योगका निरूपण, पूर्वमीमांसामें धर्माधर्मका निरूपण किया गया है। उनमें आत्माका निरूपण खासरूपसे नहीं किया गया है, अतः उनसे साक्षात् आध्यात्मिक उन्नतिकी मनुष्यको आशा नहीं करनी चाहिए। हां, इतना अवश्य हो सकता है कि उनके अध्ययनसे व्युत्पत्ति हो जानेके कारण बुद्धिदोषकी निवृत्ति होनेसे वेदान्तके अध्ययनमें सरलता होती है। इसीलिए उनमें परम्परया—मोक्ष-शास्त्रव्युत्पादन द्वारा—मोक्षोपयुक्तज्ञानसाधनता आ सकती है, अतः हम उनके ऋणी हो सकते हैं।

आचार्यपाद श्रीशङ्करका श्रुतिसम्मत अद्वैततत्त्व

अब आइए वेदान्तदर्शनमें, वेदान्तमें भी आत्मस्वरूपके प्रतिपादनावसरमें श्रीशङ्कराचार्यके सिवा अन्यान्य आचार्योने श्रुतिके वास्तविक तात्पर्यको विरुद्धरूपसे ही बतलाया है, अतः उनके व्याख्यानसे आत्मतत्त्वप्रतिपत्तिकी आशा व्यर्थ है। जब हम भगवान् आचार्यपाद श्रीशङ्करके विस्तृत भाष्योंको देखते हैं, तभी हमें एक आशाका स्थान और सन्तोष प्राप्त होता है।

यह सर्वसाधारणको विदित है कि जो कोई पुरुष कपट आदि दोषोंसे रहित होता है, उसके कहे हुए वाक्यमें भी एकार्थता ही रहती है, भिन्नार्थता नहीं। यदि उस वाक्यको, जो उस निर्दुष्ट पुरुषने जिस अर्थके परिज्ञानके लिए प्रयुक्त किया है, बुद्धिकौशल्यसे अन्यार्थपरक मान लें, तो उस वक्ताके साथ अन्याय अवश्य होगा। इसी प्रकार वेदवाक्योंका, जो कि अपौरुषेय होनेके कारण सर्वथा दोषरहित हैं, मूल तात्पर्य छोड़ कर यदि अन्य स्वाभिमत ही अर्थ करें, तो अवश्य हम दोषी ठहरेंगे। भगवान् शङ्कराचार्यने उन श्रुतियोंका ऐसा ही व्याख्यान किया है, जो उनका वस्तुतः प्रतिपाद्य था। शङ्कराचार्य साक्षात् भगवान् ही थे, जिनमें छद्म या व्यर्थाभिमानका लेश भी नहीं था, अतः निर्दुष्ट अपौरुषेय वाक्योंका भगवान् ही ठीक-ठीक व्याख्यान कर सकते हैं।

.अपि च, श्रुतिके प्रत्येक वाक्योंके तात्पर्यका निर्णय करनेके लिए उपक्रमोपसंहार आदि छः प्रमाणोंकी अपेक्षा अवश्य होती है। उपक्रमोपसंहारादिषड्विध श्रुतितात्पर्यनिर्णायक प्रमाणोंकी उपेक्षा करके केवल यदि मनगढन्त अर्थ किया

[email protected]