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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 177 of 590

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Page 177

वृत्तिके साथ विषयका सम्बन्ध-विचार ] भाषानुवादसहितं १४७


अत्र केचिदाहुः—विषयविषयिभावसम्बन्ध एवेति ।
वृत्तिनिर्गमवैयर्थ्यादन्ये तद्द्वारसङ्गमम् ॥ ६६ ॥

कोई लोग कहते हैं कि केवल विषयविषयिभाव संसर्ग माना जायगा, तो वृत्तिका निकलना ही व्यर्थ होगा, अतः विषयसंयुक्तवृत्तित्तादात्म्यसम्बन्ध ही वृत्तिसे उत्पन्न होता है ॥६६॥

अन्ये तु—विषयविषयिभावमात्रनियामिका वृत्तिश्चेदनिर्गताया अप्यैन्द्रियकवृत्तेस्तन्नियामकत्वं नातिप्रसङ्गावहमिति तन्निर्गमाभ्युपगमवैयर्थ्यापत्तेः स नाऽभिसंहितः । किं तु विषयसन्निहितजीवचैतन्यतादात्म्यापन्नाया

परन्तु विषयचैतन्य और जीवचैतन्य स्वभावतः ही * निष्क्रिय हैं, अतः उनका कोई भी सन्निकर्ष नहीं हो सकता है, इसलिए 'सम्बन्धार्था वृत्तिः' यह कहना असङ्गत है ] ।

इस आक्षेपके समाधानमें कोई लोग कहते हैं कि विषयविषयिभाव सम्बन्ध ही वृत्तिसे उत्पन्न होता है † ।

कुछ लोग कहते हैं कि परोक्षापरोक्षस्थलसाधारणविषयविषयिभावमात्रमें यदि वृत्ति प्रयोजक है, तो अनिर्गत इन्द्रियवृत्तिके भी विषयविषयिभाव सम्बन्धके नियामक होनेमें कोई अतिप्रसङ्ग नहीं है, इससे वृत्तिका निर्गम व्यर्थ होगा, अतः विषयविषयिभावसम्बन्ध अभिप्रेत नहीं है, [ तात्पर्य यह है कि सिद्धान्तमें—परोक्षविषयस्थलमें अनुमित्यादि वृत्तिसे उपहित जीवचैतन्यका अनुमेय आदि विषयके साथ वृत्तिनिर्गमके


* यद्यपि—जैसे सुवर्ण आदिमें अन्यतर कर्म या उभय कर्मके न रहनेपर भी पार्थिव भाग और तेज भागका संयोग देखा जाता है, वैसे ही प्रकृतमें द्विविधकर्मके न रहनेपर भी संयोगसम्बन्ध क्यों न माना जाय ? यह यहाँ शङ्का होती है, किन्तु यह युक्त नहीं है, क्योंकि विषयचैतन्य और जीवचैतन्यका सुवर्णदृष्टान्तके अनुसार आरम्भसे ही संयोगका स्वीकार किया जायगा तो वृत्तिका अङ्गीकार ही निरर्थक होगा, क्योंकि जो संयोग आरम्भसे ही सिद्ध है, उसकी उत्पत्ति वृत्ति कैसे करेगी, अतः आरम्भसे उनका संयोगसम्बन्ध नहीं माना जायगा, यह भाव है ।

† विषयचैतन्य और जीवचैतन्यका वृत्तिकी उत्पत्तिके पूर्वमें विषय-विषयिभाव सम्बन्ध नहीं रहता है, परन्तु वृत्तिके अनन्तर विषयविषयिभाव सम्बन्ध उत्पन्न होता है, और यह अनिर्वचनीय एवं अतिरिक्त है, यह आक्षेपपरिहार करनेवाले 'केचित्तु'का अभिप्राय है, अर्थात् संयोग या तादात्म्यका वृत्तिसे आधान—उत्पत्ति—नहीं होता है, परन्तु उक्त विषयविषयिभाव सम्बन्ध ही उत्पन्न होता है, अतः दोष नहीं है, यह भाव है ।

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