सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in context| १३४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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प्रसङ्गः । तस्य ब्रह्मस्वरूपत्वेनाऽकार्यत्वात् । एवं च विवरणे जीवस्य सुखादिकर्तृत्वोक्तिः, वीक्षणमात्रसाध्यत्वात् वियदादि वीक्षितम्, हिरण्य-
ज्ञानमें यह प्रसङ्ग नहीं है, क्योंकि ज्ञानके ब्रह्मस्वरूप होनेसे वह किसीका भी कार्य नहीं है । [ तात्पर्यार्थ यह है कि सच्चिदानन्द परमात्मा समस्त जगत्का कर्ता है और पूर्वमतमें कर्ता वह कहा गया है—जिसमें कार्यका ठीक-ठीक परिज्ञान, उसकी चिकीर्षा (कार्यको बनानेकी प्रबल इच्छा) और कार्य-विषयिणी (कार्यानुकूल) कृति हो । जो कर्ता होता है, उसमें कार्यविषयक ज्ञान, कार्यविषयक चिकीर्षा और तदनुकूल कृति रहती है, जैसे—घटका कर्ता है—कुम्भकार, उसमें घटका ज्ञान, घटकी चिकीर्षा और घटानुकूल कृति, ये तीनों विद्यमान हैं । तुल्य युक्तिसे ईश्वरमें भी उपाधिवश कार्यानुकूल ज्ञान, चिकीर्षा और कृति माननी ही पड़ेगी, अन्यथा ईश्वरके कर्तृत्वका निर्वाह नहीं होगा । ऐसी परिस्थितिमें कर्ताके लक्षणमें प्रविष्ट जो चिकीर्षा और कृति है, उनको कार्य माना जाय या नहीं ? यदि उनको कार्य न माना जाय, तो ईश्वरसे अन्य चिकीर्षा और कृतिके भी नित्य होनेसे अद्वितीयत्वश्रुतिके साथ विरोध होगा, इसलिए चिकीर्षा और कृतिको कार्य अवश्य मानना होगा, यदि वे कार्य हैं, तो चिकीर्षाके अनुकूल द्वितीय चिकीर्षा और कृतिके अनुकूल अन्य कृति माननी होगी, इस प्रकार द्वितीय चिकीर्षा और कृतिके कार्य होनेसे तदनुकूल तृतीय चिकीर्षा और कृति माननी होगी, अतः इस क्रमसे विचारधारा करनेपर अनवस्था ही होगी, ज्ञानके ब्रह्मस्वरूप होनेसे वह नित्य है, अतः तत्प्रयुक्त अनवस्था नहीं हो सकती है, इसलिए चिकीर्षा और कृतिसे रहित—'कार्यानुकूल' अर्थात् कार्यके लिए उपयुक्त जो ज्ञान तद्वान् जो हो वह कर्ता है—इस प्रकार प्रथम लक्षणमें अरुचि बतलाकर कर्ताका लक्षण कहा गया, यह भाव है ] । इच्छा और कृतिका कर्ताके लक्षणमें प्रवेश नहीं है, अतः विवरणमें सुख आदिका जीव कर्ता है, ऐसा कहा गया है* । और वीक्षणमात्रसे साध्य होनेसे वियद् आदि वीक्षित कहे गये हैं, हिरण्यगर्भ द्वारा भौतिक
* यह तात्पर्य है—जीवमें सुख आदिकी उत्पत्तिके अनुकूल ज्ञान है, परन्तु सुख आदिकी उत्पत्तिके अनुकूल इच्छा या कृति नहीं है, क्योंकि, ऐसा अनुभूत नहीं है, और किसी तन्त्रकारने स्वीकार भी नहीं किया है। इसीलिए कार्यानुकूल ज्ञानवत्त्वरूपकर्तृत्वका अङ्गीकार करके ही विवरणकारका उक्त वचन सङ्गत होता है, अन्यथा सङ्गत नहीं होगा।