सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in context| १३२ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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प्रातिभासिकरूप्यादेः प्रकृतिर्जीवसंश्रया ।
अविद्येशाश्रया माया विश्वस्येत्यपरे जगुः ॥ ५२ ॥
प्रातिभासिक रूप्य आदिकी प्रकृति ( उपादान ) जीववृत्ति अविद्या है और ईशमें रहनेवाली माया समस्त विश्वकी प्रकृति है, ऐसा कोई-कोई कहते हैं ॥५२॥
जीवाश्रिताविद्यानिवहाद्भिन्ना मायैव ईश्वराश्रिता प्रपञ्चकारणम् । जीवानामविद्यास्तु आवरणमात्रे प्रातिभासिकशुक्तिरजतादिविक्षेपेऽपि च उपयुज्यन्ते इत्यपरे ॥ ७ ॥
ईशस्य कर्तृता कीदृक् ? तत्र केचित् प्रचक्षते ।
कार्यानुकूलविज्ञानचिकीर्षाकृतिकेति ताम् ॥ ५३ ॥
ईश्वरमें कैसा कर्तृत्व है ? इस प्रश्नके उत्तरमें कोई लोग कहते हैं कि कार्यानुकूल ज्ञानचिकीर्षा-कृतिमत्त्व ही कर्तृत्व है ॥५३॥
अवसितमुपादानत्वम्, तत्प्रसक्तानुप्रसक्तं च ।
कुछ लोगोंका यह मत है कि जीवोंमें रहनेवाले अज्ञानके समुदायसे ईश्वरमें रहनेवाली माया पृथक् है और यही समस्त वियद् आदि संसारके प्रति उपादान है । और जीवोंकी अविद्या आवरणमात्रमें और उपादानरूपसे प्रातिभासिक शुक्ति आदि विक्षेपमें उपयुक्त होती है * ॥७॥
[ अभिन्ननिमित्तोपादानत्वरूप ब्रह्मलक्षणमें प्रविष्ट ] उपादानत्वका लक्षण समाप्त हुआ और उसके प्रसङ्गसे प्राप्त जीवेश्वरस्वरूपनिरूपण तथा जीवेश्वर-स्वरूपनिरूपणके अनन्तर प्राप्त जीवैकत्व, नानात्व आदिका भी निरूपण समाप्त हुआ । [ अब कर्तृत्वका निरूपण करते हैं ]—
बुद्धिजन्य नहीं हैं, किन्तु अनेकद्रव्यजन्य ही हैं, क्योंकि अनेक द्वित्व आदिकी और उनकी उत्पत्ति आदिकी कल्पनामें गौरव है इसलिए अपेक्षाबुद्धि द्वित्व आदिकी व्यञ्जक है, यह माना गया है ।
* यद्यपि जीवाश्रित अविद्या स्वाप्न प्रपञ्चके प्रति उपादान है, अतः इसका स्वप्नप्रपञ्चमें भले ही उपयोग हो, परन्तु शुक्तिरजतके प्रति उसका उपयोग नहीं हो सकता, कारण कि रजटका अधिष्ठान जो शुक्त्यवच्छिन्न चैतन्य है, उसमें जीवाविद्या नहीं रहती है, तथापि अनुपपत्ति नहीं है, क्योंकि 'रजतादिमें' आदि पदसे स्वप्नप्रपञ्च ही गृहीत है, अथवा वाचस्पतिमिश्रके समान शुक्तिरजतादिको जीवाविद्याविषयीकृतशुक्त्याद्यवच्छिन्नचैतन्यका ही विवर्त मानकर जीवाविद्याओंका प्रातिभासिक रजत आदिके प्रति उपयोग बतलाया गया है, अतः अनुपपत्ति नहीं है ।