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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 160 of 590

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Page 160

१३० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद


प्रतिजीवमविद्याया भेदमाश्रित्य चेतरे ।
तद्विनाशक्रमान्मुक्तिव्यवस्थां संप्रचक्षते ॥४९॥

कोई-कोई प्रत्येक जीवमें अविद्याका भेद मानकर उसके विनाशक्रमसे मुक्ति-व्यवस्था करते हैं ॥४९॥

इतरे तु प्रतिजीवमविद्याभेदमभ्युपगम्यैव तदनुवृत्तिनिवृत्तिभ्यां बद्धमुक्तव्यवस्थां समर्थयन्ते ।

अविशेषेण सर्वेषामविद्यातः प्रवर्त्तते ।
प्रपञ्चोऽस्मिन्नैकतन्त्वारब्धः पक्षे पटो यथा ॥ ५० ॥

जैसे अनेक तन्तुओंसे एक पट उत्पन्न होता है, वैसे ही अविशेषसे सभी जीवोंकी अविद्यासे प्रपञ्च उत्पन्न होता है, ऐसा अनेक जीववादियोंमें कुछ लोग कहते हैं ॥५०॥

अस्मिन् पक्षे कस्याऽविद्यया प्रपञ्चः कृतोऽस्त्विति चेत्, विनिगमका-भावात् सर्वाविद्याकृतोऽनेकतन्त्वारब्धघटतुल्यः। एकस्य मुक्तौ तदविद्या-नाशे एकतन्तुनाशे पटस्येव तत्साधारणप्रपञ्चस्य नाशः, तदैव विद्यमान-


कुछ लोग प्रत्येक जीवमें अज्ञानका भेद मानकर ही अज्ञानकी अनुवृत्ति और निवृत्तिसे बन्ध और मोक्षका समर्थन करते हैं ✕ ।

इस अनेक-अज्ञानपक्षमें किसकी अविद्यासे प्रपञ्च हुआ है ? इस प्रश्नके उत्तरमें कुछ लोग कहते हैं कि जैसे अनेक तन्तुओंसे पटका आरम्भ हुआ है, वैसे ही सभी जीवोंके अज्ञानसे यह समस्त प्रपञ्च हुआ है, क्योंकि किसी एक जीवके अज्ञानसे प्रपञ्चकी उत्पत्ति माननेमें कोई बलवत्तर विनिगमक ( युक्तिविशेष ) नहीं है। जैसे एक तन्तुका नाश होनेसे उस तन्तुकी सत्त्वदशामें जो विजातीय पट था, उसका नाश हो जाता है, वैसे ही एक जीवकी अविद्याका नाश होनेसे


✕ इस पक्षमें अविद्याकी अनुवृत्ति बन्ध है और अननुवृत्ति मोक्ष है। और अविद्या प्रत्येक जीवमें अलग-अलग है। एक माननेपर बन्ध और मोक्षका उपपादन नहीं हो सकेगा। यदि शङ्का की जाय कि अविद्याके अंशके आधारपर बन्ध और मोक्षकी व्यवस्था हो सकती है ? नहीं, नहीं हो सकती, क्योंकि विरोधी विद्याका उदय होनेपर उस अविद्याका किसी अंशसे भी अवस्थान नहीं हो सकता और जीवन्मुक्तिके निर्वाहके लिए अविद्याका लेश नहीं माना गया है, किन्तु अविद्याका नाश होनेपर भी प्रारब्धके अनुसार उसके संस्कार कुछ रहते हैं, इसीको अविद्याका लेश कहा गया है। वस्तुतस्तु अविद्याका लेश है ही नहीं। अतः अविद्याका प्रत्येक जीवमें भेद मानना ही उचित है।